Thursday, 29 October 2015

आध्यात्मिक करवा चौथ बनाम फ़िल्मी दिखावटी करवा चौथ महोत्सव

आध्यात्मिक करवा चौथ बनाम फ़िल्मी दिखावटी करवा चौथ महोत्सव

कल सौभाग्यशाली स्त्रियों का पुनीत पावन करवा चौथ व्रत है।

🏻 कुछ धर्म से प्रेरित हो व्रत करेंगीं, पूजन के लिए आवश्यक सामान, आवश्यक सौभाग्यवती स्त्री का सृंगार, जप तप व्रत, आदर्श पति पत्नी बन के सुखमय दाम्पत्य जीवन के लिये ईश्वर से प्रार्थना में लींन रहेंगीं। एकल या सामूहिक पूजन द्वारा धार्मिक मन्त्रों और भजन से पूजन होगा। चन्द्रमा को दीपदान दीप यज्ञ के माध्यम से करेंगीं और घर के बड़ो का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेंगीं। पति पत्नी आनंद पूर्वक साथ भोजन ग्रहण करेंगें। ईश्वर प्रशन्न होंगे ऐसी दिव्य पूजा से और अनुदान वरदान देंगें।

कुछ TV सीरियल से प्रेरित हो उनके अनुसार दिखावटी व्रत करेंगीं, महंगा सृंगार फिल्मों वाला, महंगे गिफ़्ट और दो दिन पहले से शॉपिंग। धार्मिक पार्टी के दौरान दूसरे के वस्त्र देखने में ज्यादा व्यस्त रहेंगीं। चन्द्रमा को देखते वक्त भी मन पूर्णतया चंचल बना रहेगा। फ़ोटो खिंचवाने और भोजन प्रसाद पर ध्यान रहेगा। फ़िल्मी गीतों पर डांस कर TV सीरियल की एकता कपूर को प्रशन्न करेंगे, जिससे वो करवा चौथ पर एक और सीरियल बना के entertainment करवाये। ईकॉमर्स ऑनलाइन ऑफलाइन बिज़नेस वालों को लाभ पहुंचाएंगी और घर का बजट बिगाड़ेंगीं।

भावे ही विद्यते देवाः", ईश्वर भाव में बसते हैं। वे प्रेम और भाव के भूखे हैं, कर्मकांड द्वारा मन की भावनाएं अर्पित की जाती है। जिस प्रकार बिन आत्मा शरीर मृत है उसी प्रकार बिन भाव के पूजन व्यर्थ है मृत है प्रभावहीन है। इसी बात को ये भजन बताता है-

सबसे ऊंची प्रेम सगाई-2,
दुर्योधन घर मेवा त्यागा,
शाक विदुर घर खाई, सबसे ऊंची...

शबरी के बेर सुदामा के तन्दुल,
प्रेम विवश भये रघुराई, सबसे ऊंची...

प्रेम विवश अर्जुन रथ हाँक्यों,
भूल गए ठकुराई, सबसे ऊंची....

स्वयं विचार करें... पूजन में दुर्योधन सा दिखावा करेंगें या विदुर सा प्रेम भाव....

Wednesday, 28 October 2015

कार्तिक मास का महात्म्य

॥श्रीहरिः॥
.
कार्तिक मास का महात्म्य :

* कार्तिक मास के समान कोई मास नही, सतयुग के समान कोई युग नही, वेद के समान कोई शास्त्र नही और गंगा जी के सामान कोई तीर्थ नही |
* कार्तिक मास में पालने योग्य नियम –
* दीपदान करें, तुलसी वन या तुलसी के पौधे लगाये, तुलसी को सुबह आधा-एक गिलास पानी देना, स्वर्ण दान का फल देता है |
* भूमि पर शयन अथवा गद्दा हटाकर, सादा गुदड़ी बिछा कर तख़्त पर शयन तथा ब्रह्मचर्य का पालन करने से जीवात्मा का उद्धार होता है |
* उड़द, मसूर आदि भारी चीजों का त्याग तथा तिल का दान करें तथा गंगा स्नान करे न सम्भव हो तो मानसिक स्नान नदी में कर लें |
* साधू-संतो का सत्संग, जीवन चरित्र का अनुसरण करके, मोक्ष प्राप्ति का इरादा बना ले |
* आंवले के वृक्ष की छाया में भोजन करने से एक वर्ष तक के अनगिनत पाप नष्ट हो जाते हैं, आंवले के उबटन से स्नान करने से लक्ष्मी प्राप्ति होती है, और अधिक प्रसन्नता मिलती है, संक्रांति, ग्रहण और रविवार को आंवले का उपयोग नही करना चाहिये |
. विष्णु सहस्र नाम, श्रीगीता जी , रामायण, मानस या भागवत आदि का पाठ करें।
॥श्रीहरि

सुख - दुख क्या है

सुख - दुख क्या है ?

जीवन में प्रत्येक व्यक्ति सुख के लिए प्रयत्न करता है परंतु सुख से पूर्व दुख क्यों आता है ? वास्तविकता में दुख तो है ही नहीं । जो मन के अनुकूल होता है वह सुख है और जो मन के प्रतिकूल होता है वह दुख लगता है । अत: सुख और दुख मन:स्थिति है ।
ये संसार परमात्मा का है । संसार में हम सब परमात्मा के अंश है । अत: भगवान हमारे हैं । अपने भगवान के संसार में सब कुछ प्रभु का है, 'मेरा' कुछ भी नहीं है । किसी भी व्यक्ति या वस्तु से 'मेरा' संबंध कटते ही दुख कटता है और सुख आ जाता है ।
शिक्षा - हमारे भगवान का संसार दुख रूप तो हो ही नहीं सकता । भगवान कभी दर्द तो हे ही नहीं सकते । वे तो सच्चिदानंद हैं, आनंदमय हैं, सबको आनंद ही आनंद देते है और चेतन ही आनंद उठाता है । अत: अपने को चेतन बनाना है । अपने तार भगवान से जोड़ने से ही भगवान से संबंध जुड़ जाता है और आनंद का लाभ उठाया जा सकता है । सत्संग के अभाव में अथवा बुद्धि की अपरिपक्वता में व्यक्ति जिद्दी हो जाता है और कहने लगता है कि "मैं जो कहता हूं वही सत्य है, अपितु होना यह चाहिए कि जो सत्य है वही मैं कहता हूं।"हम सत्य की संतान हैं। अत: सत्य का पालन करें ।

Tuesday, 27 October 2015

क्यों चढ़ाते है हनुमान को सिंदुर

क्यों चढ़ाते है हनुमान को सिंदुर ?

हिन्दू धर्म में सिंदूर को सुहाग का प्रतीक माना जाता है । प्रत्येक सुहागन स्त्री इसे अपनी मांग में लगाती है । सिंदूर का हिन्दू धर्म में पूजा पाठ में भी महत्तव है । कई देवी देवताओं को सिंदूर चढ़ाया जाता है । हनुमान जी को भी ऊपर से नीचे तक सिंदूर चढ़ायान जाता है,  जिसका वर्णन तुलसीदास जी ने भी रामचरित मानस में इस तरह से किया है -

रामचरित मानस के अनुसार जब श्रीराम लक्ष्मण और सीता सहित अयोध्या लौट आए तो एक दिन हनुमान जी माता सीता के कक्ष में पहुंचे । उन्होंने देखा कि माता सीता लाल रंग की कोई चीज मांग में सजा रही हैं । हनुमान जी ने उत्सुक हो माता सीता से पूछा यह क्या है जो आप मांग में सजा रही हैं ? माता सीता ने कहा यह सौभाग्य का प्रतीक सिंदूर है । इसे मांग में सजाने से मुझे भगवान राम का स्नेह प्राप्त होता है और उनकी आयु लंबी होती है । यह सुन कर हनुमान जी से रहा न गया ओर उन्होंने अपने पूरे शरीर को सिंदूर से रंग लिया तथा मन ही मन विचार करने लगे इससे तो मेरे प्रभु श्रीराम की आयु ओर लम्बी हो जाएगी और वह मुझे अति स्नेह भी करेंगे । सिंदूर लगे हनुमान जी प्रभु राम की सभा में चले गए ।
भगवान राम ने जब हनुमान को इस रुप में देखा तो हैरान रह गए । भगवान राम ने हनुमान से पूरे शरीर में सिंदूर लेपन करने का कारण पूछा तो हनुमान जी ने साफ-साफ कह दिया कि इससे आप अमर हो जाएंगे और मुझे भी माता सीता की तरह आपका स्नेह मिलेगा । हनुमान जी की इस बात को सुनकर श्रीराम भाव विभोर हो गए और हनुमान जी को गले से लगा लिया । उस समय से ही हनुमान जी को सिंदूर अति प्रिय है और सिंदूर अर्पित करने वाले पर हनुमान जी प्रसन्न रहते हैं ।

Monday, 26 October 2015

सोमबार ब्रत की पौराणिक कथा

हिंदू मान्यताओं के अनुसार सप्ताह के सात दिनों में प्रत्येक दिन किसी ना किसी भगवान की पूजा की जाती है । सप्ताह के पहले दिन अर्थात सोमवार को भगवान शिव की पूजा की जाती है ...आइए जानते है कि क्यों करते है सोमवार को भगवान शिव की पूजा ?

पौराणिक मान्यता है कि सोमवार के दिन रखे जाने वाले व्रत को सोमेश्वर व्रत के नाम से जाना जाता है क्योंकि इसी दिन चन्द्रमा की पूजा भी की जाती है । हमारे धर्मग्रंथों में सोमेश्वर शब्द के दो अर्थ होते हैं । पहला अर्थ है – सोम यानी चन्द्रमा । चन्द्रमा को ईश्वर मानकर उनकी पूजा और व्रत करना । सोमेश्वर शब्द का दूसरा अर्थ है- वह देव, जिसे सोमदेव ने भी अपना भगवान माना है और वह देवता हैं – भगवान शिव । ऐसा माना जाता है कि सोमदेव ने भगवान शिव की आराधना की जिससे सोमदेव निरोगी हुए और उन्होंने फिर से अपने सौंदर्य को प्राप्त किया । भगवान शंकर ने भी प्रसन्न होकर दूज यानी द्वितीया तिथि के चन्द्रमा को अपनी जटाओं में मुकुट की तरह धारण किया । परंपरा के अनुसार सोमवार व्रत पर लोग भगवान शिव और पार्वती की पूजा करते आ रहे हैं क्योंकि ये चंद्र उपासना से ज्यादा भगवान शिव की उपासना के लिए प्रसिद्ध हो गया है । भगवान शिव की सच्चे मन से पूजा कर सुख और कामनापूर्ति होती है ।

Sunday, 25 October 2015

जाने करवा चौथ ब्रत बिधि और पौराणिक कथा

जाने करवा चौथ ब्रत बिधि और पौराणिक कथा
भारतीय संस्कृति में पति को परमेश्वर माना गया है। पति की लम्बी उम्र और सुखमय दांपत्य जीवन के लिए हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को करवा चौथ का व्रत किया जाता है। इस शुभ दिवस पर विवाहित और सौभाग्यवती स्त्रियां अपने अटल सुहाग, पति की दीर्घ आयु और दांपत्य जीवन में मंगल कामना के लिए व्रत रखती है। इस दिन महिलाएं बिना पानी तक पिए दिनभर उपवास रखती हैं और शाम के समय चन्द्रमा को अर्घ्य देती है और फिर उसे छलनी से देखती है। उसके बाद वे अपने पति के हाथ से पानी ग्रहण कर इस उपवास को पूर्ण करती है।

कैसे करें करवा चौथ की कथा नारद पूराण के अनुसार इस दिन भगवान गणेश की पूजा करनी चाहिए। इस व्रत पर केवल महिलाओं का अधिकार बताया गया है। इस व्रत को सोलह या बारह वर्षों तक कर उद्यापन कर देना चाहिए। जानिए कैसे करें करवा चौथ व्रत:
करवा चौथ व्रत विधि

* करवा चौथ की आवश्यक संपूर्ण पूजन सामग्री को एकत्र करें।

* व्रत के दिन प्रातः स्नानादि करने के पश्चात यह संकल्प बोलकर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें- 'मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।'

* पूरे दिन निर्जला रहें।
* दीवार पर गेरू से फलक बनाकर पिसे चावलों के घोल से करवा चित्रित करें। इसे वर कहते हैं। चित्रित करने की कला को करवा धरना कहा जाता है।
* आठ पूरियों की अठावरी बनाएं। हलुआ बनाएं। पक्के पकवान बनाएं।
* पीली मिट्टी से गौरी बनाएं और उनकी गोद में गणेशजी बनाकर बिठाएं।
* गौरी को लकड़ी के आसन पर बिठाएं। चौक बनाकर आसन को उस पर रखें। गौरी को चुनरी ओढ़ाएं। बिंदी आदि सुहाग सामग्री से गौरी का श्रृंगार करें।
* जल से भरा हुआ लोटा रखें।
* वायना (भेंट) देने के लिए मिट्टी का टोंटीदार करवा लें। करवा में गेहूं और ढक्कन में शक्कर का बूरा भर दें। उसके ऊपर दक्षिणा रखें।
* रोली से करवा पर स्वस्तिक बनाएं।
* गौरी-गणेश और चित्रित करवा की परंपरानुसार पूजा करें। पति की दीर्घायु की कामना करें।
'
नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभाम्‌। प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे॥'
* करवा पर 13 बिंदी रखें और गेहूं या चावल के 13 दाने हाथ में लेकर करवा चौथ की कथा कहें या सुनें।
* कथा सुनने के बाद करवा पर हाथ घुमाकर अपनी सासुजी के पैर छूकर आशीर्वाद लें और करवा उन्हें दे दें।
* तेरह दाने गेहूं के और पानी का लोटा या टोंटीदार करवा अलग रख लें।
* रात्रि में चन्द्रमा निकलने के बाद छलनी की ओट से उसे देखें और चन्द्रमा को अर्घ्य दें।
* इसके बाद पति से आशीर्वाद लें। उन्हें भोजन कराएं और स्वयं भी भोजन कर लें
करवा चौथ की पौराणिक कथा 1
पुराणों के अनुसार करवा नाम की एक पतिव्रता धोबिन अपने पति के साथ तुंगभद्रा नदी के किनारे स्थित गांव में रहती थी। उसका पति बूढ़ा और निर्बल था।
एक दिन जब वह नदी के किनारे कपड़े धो रहा था तभी अचानक एक मगरमच्छ वहां आया, और धोबी के पैर अपने दांतों में दबाकर यमलोक की ओर ले जाने लगा। वृद्ध पति यह देख घबराया और जब उससे कुछ कहते नहीं बना तो वह करवा..! करवा..! कहकर अपनी पत्नी को पुकारने लगा।
पति की पुकार सुनकर धोबिन करवा वहां पहुंची, तो मगरमच्छ उसके पति को यमलोक पहुंचाने ही वाला था। तब करवा ने मगर को कच्चे धागे से बांध दिया और मगरमच्छ को लेकर यमराज के द्वार पहुंची।
उसने यमराज से अपने पति की रक्षा करने की गुहार लगाई और साथ ही यह भी कहा की मगरमच्छ को उसके इस कार्य के लिए कठिन से कठिन दंड देने का आग्रह किया और बोली- हे भगवन्! मगरमच्छ ने मेरे पति के पैर पकड़ लिए है। आप मगरमच्छ को इस अपराध के दंड-स्वरूप नरक भेज दें।
करवा की पुकार सुन यमराज ने कहा- अभी मगर की आयु शेष है, मैं उसे अभी यमलोक नहीं भेज सकता। इस पर करवा ने कहा- अगर आपने मेरे पति को बचाने में मेरी सहायता नहीं कि तो मैं आपको श्राप दूंगी और नष्ट कर दूंगी।
करवा का साहस देख यमराज भी डर गए और मगर को यमपुरी भेज दिया। साथ ही करवा के पति को दीर्घायु होने का वरदान दिया।
तब से कार्तिक कृष्ण की चतुर्थी को करवा चौथ व्रत का प्रचलन में आया। जिसे इस आधुनिक युग में भी महिलाएं अपने पूरी भक्ति भाव के साथ करती है और भगवान से अपनी पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं
करवा चौथ पौराणिक कथा 2

Karwa Chauth Katha
करवा चौथ की पौराणिक कथा के अनुसार एक समय की बात है, जब नीलगिरी पर्वत पर पांडव पुत्र अर्जुन तपस्या करने गए। तब किसी कारणवश उन्हें वहीं रूकना पड़ा। उन्हीं दिनों पांडवों पर गहरा संकट आ पड़ा।
तब चिंतित व शोकाकुल द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान किया तथा कृष्‍ण के दर्शन होने पर पांडवों के कष्टों के निवारण हेतु उपाय पूछा।
तब कृष्ण बोले- हे द्रौपदी! मैं तुम्हारी चिंता एवं संकट का कारण जानता हूं। उसके लिए तुम्हें एक उपाय करना होगा। जल्दी ही कार्तिक माह की कृष्ण चतुर्थी आने वाली है, उस दिन तुम पूरे मन से करवा चौथ का व्रत रखना। भगवान शिव, गणेश एवं पार्वती की उपासना करना, तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जाएंगे तथा सबकुछ ठीक हो जाएगा।
कृष्ण की आज्ञा का पालन कर द्रोपदी ने वैसा ही करवा चौथ का व्रत किया। तब उसे शीघ्र ही अपने पति के दर्शन हुए और उसकी सारी चिंताएं दूर हो गईं।
जब मां पार्वती द्वारा भगवान शिव से पति की दीर्घायु एवं सुख-संपत्ति की कामना की विधि पूछी तब शिव ने 'करवा चौथ व्रत’रखने की कथा सुनाई थी

शरदपूर्णिमा की पौराणिक कथा


सोमवार, 26 अक्टूबर 2015 को शरद पूर्णिमा है , इस रात्रि को चंद्रमा अपनी समस्त कलाओं के साथ होता है और धरती पर अमृत वर्षा करता है। रात्रि 12 बजे होने वाली इस अमृत वर्षा का लाभ मानव को मिले इसी उद्देश्य से चंद्रोदय के वक्त गगन तले खीर या दूध रखा जाता है जिसका सेवन रात्रि 12 बजे बाद किया जाता है। खीर देवताओं का प्रिय भोजन भी है। ऐसी मान्यता है कि इस खीर को खाने वाला व्यक्ति वर्ष भर निरोग रहता है। उसका शरीर पुष्ट होता है। ज्योतिष की दर्ष्टि से चंद्रमा गृह भी मजबूत होता

पौराणिकएवंप्रचलित कथा -एक कथा के अनुसार एक साहुकार को दो पुत्रियां थीं। दोनो पुत्रियां पूर्णिमा का व्रत रखती थीं। लेकिन बड़ी पुत्री पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधूरा व्रत करती थी। इसका परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री की संतान पैदा होते ही मर जाती थी।उसने पंडितों से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी, जिसके कारण तुम्हारी संतान पैदा होते ही मर जाती है। पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक करने से तुम्हारी संतान जीवित रह सकती है।उसने पंडितों की सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया। बाद में उसे एक लड़का पैदा हुआ। जो कुछ दिनों बाद ही फिर से मर गया। उसने लड़के को एक पाटे (पीढ़ा) पर लेटा कर ऊपर से कपड़ा ढंक दिया। फिर बड़ी बहन को बुलाकर लाई और बैठने के लिए वही पाटा दे दिया। बड़ी बहन जब उस पर बैठने लगी जो उसका घाघरा बच्चे का छू गया।बच्चा घाघरा छूते ही रोने लगा। तब बड़ी बहन ने कहा कि तुम मुझे कलंक लगाना चाहती थी। मेरे बैठने से यह मर जाता। तब छोटी बहन बोली कि यह तो पहले से मरा हुआ था। तेरे ही भाग्य से यह जीवित हो गया है। तेरे पुण्य से ही यह जीवित हुआ है।उसके बाद नगर में उसने पूर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया।

Saturday, 24 October 2015

श्रीरामचरितमानस- इन पांच कामों से हमेशा नुकसान ही होता है, इन्हें छोड़ देना चाहिए


गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीराम चरित मानस के अरण्यकाण्ड में जब शूर्पणखा लक्ष्मण के सामने प्रणय का प्रस्ताव रखती है तब लक्ष्मण कहते हैं कि-

सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा।।
प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहि सब छाजा।।

इस दोहे में लक्ष्मण शूर्पणखा से कहते हैं कि हे सुंदरी। मैं तो श्रीराम का सेवक हूं, मैं पराधीन हूं, अत: मुझे जीवन साथी बनाकर तुम्हें सुख प्राप्त नहीं होगा। तुम श्रीराम के पास जाओ, वे ही सभी काम करने में समर्थ हैं।

सेवक सुख चह मान भिखारी। ब्यसनी धन सुख गति विभिचारी।।
लोभी जसु चह चार गुमानी। नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी।।

इस दोहे में लक्ष्मण ने 6 ऐसे पुरुषों के विषय में बात की है, जिनकी कुछ इच्छाएं पूरी होना असंभव ही है।

पहला पुरुष है सेवक-

यदि कोई सेवक सुख चाहता है तो उसकी यह इच्छा कभी भी पूरी नहीं हो सकती है। सेवक को सदैव मालिक यानी स्वामी की इच्छाओं को पूरा करने के लिए तत्पर रहना होता है। अत: वह स्वयं के सुख की कल्पना भी नहीं कर सकता।

दूसरा पुरुष है भिखारी- 

यदि कोई भिखारी ये सोचे कि उसे समाज में पूर्ण मान-सम्मान मिले, सभी लोग उसका आदर करे तो यह इच्छा कभी भी पूरी नहीं हो सकती है। भिखारी को सदैव लोगों की ओर से धिक्कारा ही जाता है, उन्हें हर बार अपमानित ही होना पड़ता है।

तीसरा पुरुष है व्यसनी यानी नशा करने वाला

यदि कोई व्यसनी (जिसे जूए, शराब आदि का नशा करने की आदत हो) यह इच्छा करे कि उसके पास सदैव बहुत सारा धन रहे तो यह इच्छा कभी पूरी नहीं हो सकती है। ऐसे लोगों के पास यदि कुबेर का खजाना भी हो तो वह भी खाली हो जाएगा। ये लोग सदैव दरिद्र ही रहते हैं। नशे की लत में अपना सब कुछ लुटा देते हैं।

चौथा पुरुष है व्यभिचारी
शास्त्रों के अनुसार व्यभिचार को भयंकर पाप माना गया है। यदि कोई पुरुष अपनी पत्नी के प्रति वफादार नहीं है और अन्य स्त्रियों के साथ अवैध संबंध रखता है तो उसे कभी भी सद्गति नहीं मिल सकती। ऐसे लोग का अंत बहुत बुरा होता है। जिस समय इनकी गुप्त बातें प्रकट हो जाती हैं, तभी इनके सारे सुख खत्म हो जाते हैं। साथ ही, ऐसे लोग भयंकर पीड़ाओं को भोगते हैं।

पांचवां पुरुष है लोभी यानी लालची
जो लोग लालची होते हैं, वे हमेशा सिर्फ धन के विषय में ही सोचते हैं, उनके लिए यश की इच्छा करना व्यर्थ है। लालच के कारण घर-परिवार और मित्रों को भी महत्व नहीं देते। धन की कामना से वे किसी का भी अहित कर सकते हैं। इस कारण इन्हें यश की प्राप्ति नहीं होती है। अत: लोभी इंसान की यश पाने की इच्छा कभी भी पूरी नहीं हो सकती है।

छठां पुरुष है अभिमानी
यदि कोई व्यक्ति घमंडी है, दूसरों को तुच्छ समझता है और स्वयं श्रेष्ठ तो ऐसे लोगों को जीवन में कुछ भी प्राप्त नहीं हो पाता है। आमतौर पर ऐसे लोग चारों फल- अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष, एक साथ पाना चाहते हैं, लेकिन यह इच्छा पूरी होना असंभव है। शास्त्रों में कई ऐसे अभिमानी पुरुष बताए गए हैं, जिनका नाश उनके घमंड के कारण ही हुआ है। रावण और कंस भी वैसे ही अभिमानी थे।

आगे का प्रसंग इस प्रकार है-

श्रीरामचरित मानस में आगे लिखा है-

पुनि फिरि राम निकट सो आई। प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई।।
लक्षिमन कहा तोहि सो बरई। जो तृन तोरि लाज परिहरई।।

इस दोहे में तुलसीदासजी ने लिखा है कि लक्ष्मण ने जब इस प्रकार शूर्पणखा को समझाया तो वह श्रीराम के पास गई और उनके सामने प्रणय का प्रस्ताव रखा। श्रीराम ने इस प्रस्ताव को अपनाने से इंकार किया और शूर्पणखा को पुन: लक्ष्मण के पास ही भेज दिया।

लक्ष्मण ने शूर्पणखा से कहा कि तुम्हारा वरण वही इंसान कर सकता है जो लज्जा यानी शर्म को त्याग सकता है। यानी कोई बेशर्म इंसान ही तुम्हारे प्रणय प्रस्ताव को स्वीकार कर सकता है।

तब खिसिआनि राम पहिं गई। रूप भयंकर प्रगटत भई।।
सीतहि सभय देखि रघुराई। कहा अनुज सन सयन बुझाई।।

लक्ष्मण द्वारा यह बात सुनकर रावण की बहन शूर्पणखा पुन: श्रीराम के पास गई और भयंकर राक्षसी रूप धारण कर लिया। इस रूप को देखकर सीता भयभीत हो गईं तब श्रीराम ने लक्ष्मण को इशारा किया कि वह शूर्पणखा को दंड दे।

श्रीराम की आज्ञा पाकर लक्ष्मण ने शूर्पणखा के नाक और कान काट दिए।

एक श्राप के कारण धृतराष्ट्र जन्मे थे अंधे, जानिए धृतराष्ट्र से जुडी ऐसी ही खास बातें

महाभारत में धृतराष्ट्र अंधे थे, लेकिन उन्हें यह अंधापन पिछले जन्म में मिले एक श्राप के कारण मिला था। धृतराष्ट्र ने ही गांधारी के परिवार को मरवाया था। लेकिन क्यों मिला था उन्हें अंधें होने का श्राप और क्यों मरवाया था उन्होंने अपनी पत्नी गांधारी के परिवार को?  आइये जानते है धृतराष्ट्र से जुडी कुछ ऐसी ही खास बातें-


भीम को मार डालना चाहते थे धृतराष्ट्र
भीम ने धृतराष्ट्र के प्रिय पुत्र दुर्योधन और दु:शासन को बड़ी निर्दयता से मार डाला था, इस कारण धृतराष्ट्र भीम को भी मार डालना चाहते थे। जब युद्ध समाप्त हो गया तो श्रीकृष्ण के साथ युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव महाराज धृतराष्ट्र से मिलने पहुंचे। युधिष्ठिर ने धृतराष्ट्र को प्रणाम किया और सभी पांडवों ने अपने-अपने नाम लिए, प्रणाम किया। श्रीकृष्ण महाराज के मन की बात पहले से ही समझ गए थे कि वे भीम का नाश करना चाहते हैं। धृतराष्ट्र ने भीम को गले लगाने की इच्छा जताई तो श्रीकृष्ण ने तुरंत ही भीम के स्थान पर भीम की लोहे की मूर्ति आगे बढ़ा दी। धृतराष्ट्र बहुत शक्तिशाली थे, उन्होंने क्रोध में आकर लोहे से बनी भीम की मूर्ति को दोनों हाथों से दबोच लिया और मूर्ति को तोड़ डाला।

मूर्ति तोड़ने की वजह से उनके मुंह से भी खून निकलने लगा और वे जमीन पर गिर गए। कुछ ही देर में उनका क्रोध शांत हुआ तो उन्हें लगा की भीम मर गया है तो वे रोने लगे। तब श्रीकृष्ण ने महाराज से कहा कि भीम जीवित है, आपने जिसे तोड़ा है, वह तो भीम के आकार की मूर्ति थी। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने भीम के प्राण बचा लिए।

धृतराष्ट्र थे जन्म से अंधे
महाराज शांतनु और सत्यवती के दो पुत्र हुए विचित्रवीर्य और चित्रांगद। चित्रांगद कम आयु में ही युद्ध में मारे गए। इसके बाद भीष्म ने विचित्रवीर्य का विवाह काशी की राजकुमारी अंबिका और अंबालिका से करवाया। विवाह के कुछ समय बाद ही विचित्रवीर्य की भी बीमारी के कारण मृत्यु हो गई। अंबिका और अंबालिका संतानहीन ही थीं तो सत्यवती के सामने यह संकट उत्पन्न हो गया कि कौरव वंश आगे कैसे बढ़ेगा।

वंश को आगे बढ़ाने के लिए सत्यवती ने महर्षि वेदव्यास से उपाय पूछा। तब वेदव्यास से अपनी दिव्य शक्तियों से अंबिका और अंबालिका से संतानें उत्पन्न की थीं। अंबिका ने महर्षि के भय के कारण आंखें बद कर ली थी तो इसकी अंधी संतान के रूप में धृतराष्ट्र हुए। दूसरी राजकुमारी अंबालिका भी महर्षि से डर गई थी और उसका शरीर पीला पड़ गया था तो इसकी संतान पाण्डु हुई। पाण्डु जन्म से ही कमजोर थे। दोनों राजकुमारियों के बाद एक दासी पर भी महर्षि वेदव्यास ने शक्तिपात किया था। उस दासी से संतान के रूप में महात्मा विदुर उत्पन्न हुए।

एक श्राप के कारण धृतराष्ट्र जन्मे थे अंधे :
धृतराष्ट्र अपने पिछले जन्म मैं एक बहुत दुष्ट राजा था। एक दिन उसने देखा की नदी मैं एक हंस अपने बच्चों के साथ आराम से विचरण कर रहा हे। उसने आदेश दिया की उस हंस की आँख फोड़ दी जायैं और उसके बच्चों को मार दिया जाये। इसी वजह से अगले जन्म मैं वह अंधा पैदा हुआ और उसके पुत्र भी उसी तरह मृत्यु को प्राप्त हुये जैसे उस हंस के।

अंधे होने के कारण धृतराष्ट्र से पहले पाण्डु बने थे राजा 
धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर के पालन-पोषण का भार भीष्म के ऊपर था। तीनों पुत्र बड़े हुए तो उन्हें विद्या अर्जित करने भेजा गया। धृतराष्ट्र बल विद्या में श्रेष्ठ हुए, पाण्डु धनुर्विद्या में और विदुर धर्म और नीति में पारंगत हो गए। तीनों पुत्र युवा हुए तो बड़े पुत्र धृतराष्ट्र को नहीं, बल्कि पाण्डु को राजा बनाया गया, क्योंकि धृतराष्ट्र अंधे थे और विदुर दासी पुत्र थे। पाण्डु की मृत्यु के बाद धृतराष्ट्र को राजा बनाया गया। धृतराष्ट्र नहीं चाहते थे कि उनके बाद युधिष्ठिर राजा बने, बल्कि वे चाहते थे कि उनका पुत्र दुर्योधन राजा बने। इसी कारण वे लगातार पाण्डव पुत्रों की उपेक्षा करते रहे।

गांधार की राजकुमारी से विवाह
भीष्म ने धृतराष्ट्र का विवाह गांधार की राजकुमारी गांधारी से कराया था। विवाह से पूर्व गांधारी को ये बात मालूम नहीं थी कि धृतराष्ट्र अंधे हैं। जब गांधारी को ये बात मालूम हुई तो उसने भी अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली। अब पति और पत्नी दोनों अंधे के समान हो गए थे। धृतराष्ट्र और गांधारी के सौ पुत्र और एक पुत्री थी। दुर्योधन सबसे बड़ा और सबसे प्रिय पुत्र था। दुर्योधन के प्रति धृतराष्ट्र को अत्यधिक मोह था। इसी मोह के कारण दुर्योधन के गलत कार्यों पर भी वे मौन रहे। दुर्योधन की गलत इच्छाओं को पूरा करने के लिए भी हमेशा तैयार रहते थे। यही मोह पूरे वंश के नाश का कारण बना।

धृतराष्ट्र ने मरवाया था गांधारी के परिवार को 
ध्रतराष्ट्र का विवाह गांधार देश की गांधारी के साथ हुआ था। गंधारी की कुंडली मैं दोष होने की वजह से एक साधु के कहे अनुसार उसका विवाह पहले एक बकरे के साथ किया गया था। बाद मैं उस बकरे की बलि दे दी गयी थी। यह बात गांधारी के विवाह के समय छुपाई गयी थी. जब ध्रतराष्ट्र को इस बात का पता चला तो उसने गांधार नरेश सुबाला और उसके 100 पुत्रों को कारावास मैं डाल दिया और काफी यातनाएं दी।

एक एक करके सुबाला के सभी पुत्र मरने लगे। उन्हैं खाने के लिये सिर्फ मुट्ठी भर चावल दिये जाते थे। सुबाला ने अपने सबसे छोटे बेटे शकुनि को प्रतिशोध के लिये तैयार किया। सब लोग अपने हिस्से के चावल शकुनि को देते थे ताकि वह जीवित रह कर कौरवों का नाश कर सके। मृत्यु से पहले सुबाला ने ध्रतराष्ट्र से शकुनि को छोड़ने की बिनती की जो ध्रतराष्ट्र ने मान ली। सुबाला ने शकुनि को अपनी रीढ़ की हड्डी क पासे बनाने के लिये कहा, वही पासे कौरव वंश के नाश का कारण बने।

शकुनि ने हस्तिनापुर मैं सबका विश्वास जीता और 100 कौरवों का अभिवावक बना। उसने ना केवल दुर्योधन को युधिष्ठिर के खिलाफ भडकाया बल्कि महाभारत के युद्ध का आधार भी बनाया।

...और धृतराष्ट्र चले गए वन में
युद्ध के बाद धृतराष्ट्र और गांधारी, पांडवों के साथ एक ही महल रहने लगे थे। भीम अक्सर धृतराष्ट्र से ऐसी बातें करते थे जो कि उन्हें पसंद नहीं थीं। भीम के ऐसे व्यवहार से धृतराष्ट्र बहुत दुखी रहने लगे थे। वे धीरे-धीरे दो दिन या चार दिन में एक बार भोजन करने लगे। इस प्रकार पंद्रह वर्ष निकल गए। फिर एक दिन धृतराष्ट्र के मन में वैराग्य का भाव जाग गया और वे गांधारी के साथ वन में चले गए।