Thursday, 5 November 2015

दिवाली के दिन शुरू हुआ था महाभारत का युद्ध, 40 लाख में से सिर्फ 12 ही बचे थे जिन्दा!



भगवान कृष्ण ने निकला था युद्ध के दिन का मुहूर्त दिवाली के दिन शुरू हुआ था महाभारत का महायुद्ध, कुरुक्षेत्र की धरती पर थे द्वेष छोटी सी बहस पे एक किसान ने अपने ही भाई का वंहा किया था खून. महाभारत के युद्ध के ऐसे कुछ तथ्य जिनसे आप अब तक अनजान होंगे, पांडवो का नेतृत्व युधिष्ठर तो कौरवो का दुर्योधन कर रहा था.

युद्ध की रणनीति पांडवो की कृष्ण और कौरवो की शकुनि कर रहा था तैयार, पांडवो के पास सात अक्षयोनि सेनाये थी तो कौरवो के पास ग्यारह की संख्या में थी. पांडवो के पास 153090 रथ और उनके साथी थे तो कौरवो के पास 240570 की गिनती में थे. 153090 हाथी और हाथीसवार योद्धा थे पांडवो के पास तो कौरवो के पास 240570 हाथी और सवार थे.


पांडवो के लिए पहले दिन से अठारहवें दिन तक धृष्टद्युमय सेना पति थे जबकि कौरवो के लिए पहले से दसवे दिन भीष्म, ग्यारहवे से पंद्रहवे दिन द्रोणाचार्य और सलाह व् सत्रहवें दिन कर्ण था सेना पति आखिरी दिन शल्य थे कौरवो के सेना पति. पांडवो के पास 459270 घोड़े और घुड़सवार थे जबकि कौरवो के पास 721710 की संख्या में थे, पैदल सैनिक पांडवो के पास 765450 थे तो कौरवो के पास 1202850 की संख्या में थे.

कुल मिला के पांडव सेना 1530900 थी तो कौरव सेना 2405700 थी, पांडवो की तरफ से पांच पांडव कृष्ण सत्याकी और युयुत्सु बचे थे तो कौरवो में कृपाचार्य अश्वथामा कृतवर्मा और वृषकेतु जीवित बचे थे. ये महायुद्ध के आंकड़े विकिपीडिया से लिए गए है, हालाँकि भारत का महाग्रंथ महाभारत भी इसकी पुष्टि करता है. 

युद्ध के दसवे दिन तक भीष्म कौरवो के सेनापति थे और तब तक कौरव ही युद्ध में जीत के हक़दार थे, एक और बात जब तक भीष्म सेनापति थे उन्होंने कर्ण को युद्ध लड़ने की इजाजत नही दी थी क्योंकि वो एक सूत पुत्र था. ग्यारहवे दिन से कर्ण ने युद्ध में शिरकत की और ड्रोन सेना पति बने जिन्होंने युधिष्ठर को अगवा करने की योजना पर काम किया जो की अभिमन्यु की मौत के बाद त्यागा गया, क्योंकि अभिमन्यु को युद्ध के कायदो को तोड़के मार गया था.


युद्ध में कुछ कायदे कानून बनाये गए थे जो की युद्ध शुरू होने से पहले ही तय किये गए थे इनमे से मुख्य कुछ इस तरह थे, एक योद्धा एक समय में एक से लड़ेगा, निहत्थे पर वार नही होगा रथ से उत्तर जाने पर किसी पे हमला नही होगा. घायल और अधमरे या बेहोश की हत्या नही होगी गदा युद्ध में जंघा पर वार नही होगा और महारथी किसी महिला पे वार नही करेंगे.


अभिमन्यु पे पेंतीस योद्धाओ ने एक साथ आक्रमण किया निहत्था होने और रथ से उतरे होने पर भी उसपे हमले हुए इतना ही नही पीठ के पीछे से भी वार कर अभिमन्यु को मारा गया था. 

कौरवो ने एक बार नियम क्या तोडा पांडवो ने उसे अपना हथियार बना लिया कर्ण, द्रोणाचार्य भूरिश्रवा दुर्योधन शकुनि दुस्साशन युद्ध नियम के विपरीत ही मारे गए थे.

धनतेरस से जुडी है एक पौराणिक कलेजा भर आने वाली कहानी


दिवाली से ठीक दो दिन पहले यानि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है धनतेरस का त्यौहार, इस दिन सोने चांदी की खूब खरीदारी होती है और रात में दिन दान द्वारा धन्वन्तरि की पूजा होती है. लेकिन इस दिन के पीछे की छुपी कहानी जान आप बच सकते है असमय/अकाल मृतरयु से.

एक बार यमराज ने अपने गणो से पूछा की तुम लोग मेरे कहने पर जीवो के प्राण हरने का काम करते हो क्या तुम्हे कभी इसमें कुछ अजीब नही लगा या तुम्हे तरस नही आया. इस्पे सब गणो ने अपनी कर्तव्य निष्ठां जताई लेकिन जब यमराज ने पुनः पूछा की संकोच न करो मुझे बताओ तो एक गण ने बताया की महाराज एक बार ऐसा हुआ था की हमारा भी कलेजा भर आया था.

राजा हिमा को पुत्र हुआ तो आनंद उत्सव हुआ लेकिन जन्म कुंडली के हिसाब से उसकी मृत्यु शादी के चार दिन बाद ही निश्चित थी, इस कारन राजा उसे एक जंगल में यमुना नदी के किनारे एक गुफा में रख आया. लेकिन होनी को कौन टाल सकता था, हंस राजा की बेटी वंहा से वन विहार करती गुजरी और राजकुमार को देख रीझ गई और गन्धर्व विवाह कर लिया.

दोनों की जोड़ी कामदेव और रति सरीखी थी दोनों में अटूट प्रेम था लेकिन जब चौथे दिन हम राजकुमार के प्राण हरने गए तो हमारा कलेजा पसीज गया. यमराज में सुन द्रवित हो गए लेकिन विधि के विधान को कौन टाल सकता है तब एक यम ने पूछा की प्रभु ऐसी अकाल मृत्यु को टाला नही जा सकता है क्या?

इस पर यमराज ने कहा की धन तेरस के दिन दिन दान और विधि पूर्वक पूजन होता है धन धन्य को खुला रखा जाता है और रात भर तेल के दिए जलाये जाते है उन मनुष्यो की कभी भी अकाल मृत्यु नही होती है.

श्रीकृष्ण के कहने पर दिवाली के अगले दिन गाय के गोबर की, की जाती है पूजा!

बात हजारो वर्षो पूर्व की है जब भगवान कृष्ण ने अपनी बाल लीलाओ से पुरे वृन्दावन में धूम मचा रही थी, ऐसे में ही उन्होंने इंद्र के घमंड को चूर करने की सोची. मथुरा वृन्दावन और समस्त ब्रज क्षेत्र के लोग दीवपळी के अगले दिन इंद्र की पूजा करते थे, उनकी मान्यता थी की अगर ऐसा नही करेंगे तो इंद्र देव नाराज हो जायेंगे.

लेकिन ऐसे में कृष्ण ने सबकी समझाया की असल में वर्षा का कारन इंद्र देव नही बल्कि गोवर्धन पर्वत है, जिसकी हरियाली बदलो को कर्षित करती है. गोवर्धन पर्वत की ऊंचाई से बदल घिर के वंही बरसते है उसी से हमारी गायो को चारा मिलता है, ब्रजमंडल की खुशहाली का कारण गोवर्धन पर्वत है न की इंद्र देव.

सबको हालाँकि डर लग रहा था लेकिन बाद में कृष्ण की बात समझ में आ गई और वृन्दावन के वासियो ने गोवर्धन पर्वत की पूजा की और इंद्र को चढ़ाये जाने वाली सारी सामग्री गोवर्धन को चढ़ी, गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा की गई और साथ में गौ धन यानी गायो की भी पूजा की गई.

जब ये बात इंद्र को पता चली तो उसके क्रोध की सीमा न रही, इंद्र ने वायु जल देवता को वृन्दावन पे कहर ढाने के लिए भेजा. लगातार  तेज हवाई और वर्षा तूफान शुरू हो गए, तब पुरे नगर वासी नन्द बाबा के यंहा पहुंचे और कृष्ण के कहे अनुसार करने पर इंद्र देव के प्रकोप का उलाहना देने लगे.

तब भगवान कृष्ण ने सबको गोवर्धन पर्वत की तरफ जाने को कहा, उन्होंने कहा की गोवर्धन पर्वत उनकी रक्षा करेंगे और देखते ही देखते पूरा नगर अपने पशुधन समेत गोवर्धन पर्वत के पास पहुंचा. तब स्वयं इंद्र भी आ पहुंचा और बारिश ओले आदि मौसमी विपदा की हद पार कर दी.
तब भगवान कृष्ण ने अपनी दहिये हाथ की सबसे छोटी अंगुली मात्र पर गोवर्धन को उठा लिया और सारे वृन्दावन वासी उसकी ओट में डट गए. लगातार सात दिन और सात रातों तक बारिश और तूफान चला लेकिन वृन्दावन वासी गोवर्धन पर्वत की ओट में सुरक्षित थे.

तब इंद्र को कृष्ण की हक़ीक़त का ज्ञान हुआ और उसने तुरंत अपने सारे प्रकोप रोके और भगवान कृष्ण से क्षमा याचना की, तब इंद्र को माफ़ी मिली और तब से ही इंद्र की पूजा बंद हो गई. उसी दिन से पुरे भारत भर में दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा होने लगी.

पूरा भारत गोवर्धन पर्वत की पूजा के लिए नही पहुँच सकता था इसलिए भगवान कृष्ण ने गाय के गोबर से छोटा पर्वत बना उसकी ही पूजा और परिक्रमा को गोवर्धन पर्वत की पूजा के तुल्य बता दिया था. गोवर्धन का अर्थ है गौ धन, मतलब गाय यानि गाय भी गोवर्धन इसलिए भारत में कई स्थानो पर गाय की भी इस दिन पूजा की जाती है

Friday, 30 October 2015

ब्रम्हांड और उसकी उत्पत्ति - नासदीय सूक्त, ऋग्वेद(10:129

ब्रम्हांड और उसकी उत्पत्ति - नासदीय सूक्त, ऋग्वेद(10:129)

     
            ब्रम्हांड एक खुला स्थान है, जिसकी कोई सीमायें नहीं हैं, कोई अंत नहीं है। इसकी लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई और गहराई अनंत हैं। पर इसकी रचना कैसे और क्यों हुई? नासदीय सूक्तः जो की सृष्टि की रचना के मंत्र के रूप में भी जाना जाता है, ऋग्वेद के 10वें मंडल का 129वां सूक्त है। इसका संबंध ब्रह्माण्ड विज्ञान और ब्रह्मांड की उत्पत्ति के साथ है। नासदीय सूक्त में कुल ७ मन्त्र हैं:-

नासदीय सूक्त के ७ मंत्रों की हिंदी में संछिप्त व्याख्या :

१. नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् ।

किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरम् ॥ १॥

इस जगत् की उत्पत्ति से पहले ना ही किसी का आस्तित्व था और ना ही अनस्तित्व, मतलब इस जगत् की शुरुआत शून्य से हुई। 
तब न हवा थी, ना आसमान था और ना उसके परे कुछ था,

चारों ओर समुन्द्र की भांति गंभीर और गहन बस अंधकार के आलावा कुछ नहीं था। 

२. न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः ।
आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किञ्चनास ॥२॥

उस समय न ही मृत्यु थी और न ही अमरता, मतलब न ही पृथ्वी पर कोई जीवन था और न ही स्वर्ग में रहने वाले अमर लोग थे,
उस समय दिन और रात भी नहीं थे। 
उस समय बस एक अनादि पदार्थ था(जिसे प्रकृति कहा गया है), मतलब जिसका आदि या आरंभ न हो और जो सदा से बना चला आ रहा हो।

३. तम आसीत्तमसा गूहळमग्रे प्रकेतं सलिलं सर्वाऽइदम् ।
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाजायतैकम् ॥३॥

शुरू में सिर्फ अंधकार में लिपटा अंधकार और वो जल की भांति अनादि पदार्थ था जिसका कोई रूप नहीं था, अर्थात जो अपना आयतन न बदलते हुए अपना रूप बदल सकता है। 
फिर उस अनादि पदार्थ में एक महान निरंतर तप् से वो 'रचयिता'(परमात्मा/भगवान) प्रकट हुआ। 

४. कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् ।
सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा ॥४॥

सबसे पहले रचयिता को कामना/विचार/भाव/इरादा आया सृष्टि की रचना का, जो की सृष्टि उत्पत्ति का पहला बीज था,
इस तरह रचयिता ने विचार कर आस्तित्व और अनस्तित्व की खाई पाटने का काम किया। 

५. तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः स्विदासीदुपरि स्विदासीत् ।
रेतोधा आसन्महिमान आसन्त्स्वधा अवस्तात्प्रयतिः परस्तात् ॥५॥

फिर उस कामना रुपी बीज से चारों ओर सूर्य किरणों के समान ऊर्जा की तरंगें निकलीं, 
जिन्होंने उस अनादि पदार्थ(प्रकृति) से मिलकर सृष्टि रचना का आरंभ किया।

६. को अद्धा वेद क इह प्र वोचत्कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः ।

अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आबभूव ॥६॥

अभी वर्तमान में कौन पूरी तरह से ठीक-ठीक बता सकता है की कब और कैसे इस विविध प्रकार की सृष्टि की उत्पत्ति और रचना हुई, क्यूंकि विद्वान लोग तो खुद सृष्टि रचना के बाद आये।  अतः वर्तमान समय में कोई ये दावा करके ठीक-ठीक वर्णण नहीं कर सकता कि सृष्टि बनने से पूर्व क्या था और इसके बनने का कारण क्या था।  

७. इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न ।
यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद ॥७॥

सृष्टि रचना का स्रोत क्या है? कौन है इसका कर्ता-धर्ता?
सृष्टि का संचालक, अवलोकन करता, ऊपर कहीं स्वर्ग में है बैठा।
हे विद्वानों, उसको जानों.. तुम नहीं जान सकते तो कौन जान सकता है?

वेदों का हतिहास जाने

।।ॐ।। वेद 'विद' शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है ज्ञान या जानना, ज्ञाता या जानने वाला; मानना नहीं और न ही मानने वाला। सिर्फ जानने वाला, जानकर जाना-परखा ज्ञान। अनुभूत सत्य। जाँचा-परखा मार्ग। इसी में संकलित है 'ब्रह्म वाक्य'।

वेद मानव सभ्यता के लगभग सबसे पुराने लिखित दस्तावेज हैं। वेदों की 28 हजार पांडुलिपियाँ भारत में पुणे के 'भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट' में रखी हुई हैं। इनमें से ऋग्वेद की 30 पांडुलिपियाँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं जिन्हें यूनेस्को ने विरासत सूची में शामिल किया है। यूनेस्को ने ऋग्वेद की 1800 से 1500 ई.पू. की 30 पांडुलिपियों को सांस्कृतिक धरोहरों की सूची में शामिल किया है। उल्लेखनीय है कि यूनेस्को की 158 सूची में भारत की महत्वपूर्ण पांडुलिपियों की सूची 38 है।वेद को 'श्रुति' भी कहा जाता है। 'श्रु' धातु से 'श्रुति' शब्द बना है। 'श्रु' यानी सुनना। कहते हैं कि इसके मन्त्रों को ईश्वर (ब्रह्म) ने प्राचीन तपस्वियों को अप्रत्यक्ष रूप से सुनाया था जब वे गहरी तपस्या में लीन थे। सर्वप्रथम ईश्वर ने चार ऋषियों को इसका ज्ञान दिया:- अग्नि, वायु, अंगिरा और आदित्य।वेद वैदिककाल की वाचिक परम्परा की अनुपम कृति हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी पिछले छह-सात हजार ईस्वी पूर्व से चली आ रही है। विद्वानों ने संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद इन चारों के संयोग को समग्र वेद कहा है। ये चार भाग सम्मिलित रूप से श्रुति कहे जाते हैं। बाकी ग्रन्थ स्मृति के अंतर्गत आते हैं।संहिता :मन्त्र भाग। वेद के मन्त्रों में सुंदरता भरी पड़ी है। वैदिक ऋषि जब स्वर के साथ वेद मंत्रों का पाठ करते हैं, तो चित्त प्रसन्न हो उठता है। जो भी सस्वर वेदपाठ सुनता है, मुग्ध हो उठता है।ब्राह्मण : ब्राह्मण ग्रंथों में मुख्य रूप से यज्ञों की चर्चा है। वेदों के मंत्रों की व्याख्या है। यज्ञों के विधान और विज्ञान का विस्तार से वर्णन है। मुख्य ब्राह्मण 3 हैं : (1) ऐतरेय, ( 2) तैत्तिरीय और (3) शतपथ।आरण्यक : वन को संस्कृत में कहते हैं 'अरण्य'। अरण्य में उत्पन्न हुए ग्रंथों का नाम पड़ गया 'आरण्यक'। मुख्य आरण्यक पाँच हैं : (1) ऐतरेय, (2) शांखायन, (3) बृहदारण्यक, (4) तैत्तिरीय और (5) तवलकार।उपनिषद : उपनिषद को वेद का शीर्ष भाग कहा गया है और यही वेदों का अंतिम सर्वश्रेष्ठ भाग होने के कारण वेदांत कहलाए। इनमें ईश्वर, सृष्टि और आत्मा के संबंध में गहन दार्शनिक और वैज्ञानिक वर्णन मिलता है। उपनिषदों की संख्या 1180 मानी गई है, लेकिन वर्तमान में 108 उपनिषद ही उपलब्ध हैं। मुख्य उपनिषद हैं- ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मांडूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छांदोग्य, बृहदारण्यक और श्वेताश्वर। असंख्य वेद-शाखाएँ, ब्राह्मण-ग्रन्थ, आरण्यक और उपनिषद विलुप्त हो चुके हैं। वर्तमान में ऋग्वेद के दस, कृष्ण यजुर्वेद के बत्तीस, सामवेद के सोलह, अथर्ववेद के इकतीस उपनिषद उपलब्ध माने गए हैं।

वैदिक काल :प्रोफेसर विंटरनिट्ज मानते हैं कि वैदिक साहित्य का रचनाकाल 2000-2500 ईसा पूर्व हुआ था। दरअसल वेदों की रचना किसी एक काल में नहीं हुई। विद्वानों ने वेदों के रचनाकाल की शुरुआत 4500 ई.पू. से मानी है। अर्थात यह धीरे-धीरे रचे गए और अंतत: माना यह जाता है कि पहले वेद को तीन भागों में संकलित किया गया- ऋग्‍वेद, यजुर्वेद व सामवेद जि‍से वेदत्रयी कहा जाता था। मान्यता अनुसार वेद का वि‍भाजन राम के जन्‍म के पूर्व पुरुरवा ऋषि के समय में हुआ था। बाद में अथर्ववेद का संकलन ऋषि‍ अथर्वा द्वारा कि‍या गया।दूसरी ओर कुछ लोगों का यह मानना है कि कृष्ण के समय द्वापरयुग की समाप्ति के बाद महर्षि वेद व्यास ने वेद को चार प्रभागों संपादित करके व्यवस्थित किया। इन चारों प्रभागों की शिक्षा चार शिष्यों पैल, वैशम्पायन, जैमिनी और सुमन्तु को दी। उस क्रम में ऋग्वेद- पैल को, यजुर्वेद- वैशम्पायन को, सामवेद- जैमिनि को तथा अथर्ववेद- सुमन्तु को सौंपा गया। इस मान से लिखित रूप में आज से 6508 वर्ष पूर्व पुराने हैं वेद। यह भी तथ्‍य नहीं नकारा जा सकता कि कृष्ण के आज से 5112 वर्ष पूर्व होने के तथ्‍य ढूँढ लिए गए हैं।वेद के विभाग चार हैं:ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ऋग-स्थिति, यजु-रूपांतरण, साम-गति‍शील और अथर्व-जड़। ऋक को धर्म, यजुः को मोक्ष, साम को काम, अथर्व को अर्थ भी कहा जाता है। इन्ही के आधार पर धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना हुई।ऋग्वेद : ऋक अर्थात् स्थिति और ज्ञान। इसमें 10 मंडल हैं और 1,028 ऋचाएँ। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियाँ और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है। इसमें 5 शाखाएँ हैं - शाकल्प, वास्कल, अश्वलायन, शांखायन, मंडूकायन।यजुर्वेद : यजुर्वेद का अर्थ : यत् + जु = यजु। यत् का अर्थ होता है गतिशील तथा जु का अर्थ होता है आकाश। इसके अलावा कर्म। श्रेष्ठतम कर्म की प्रेरणा। यजुर्वेद में 1975 मन्त्र और 40 अध्याय हैं। इस वेद में अधिकतर यज्ञ के मन्त्र हैं। यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन है। यजुर्वेद की दो शाखाएँ हैं कृष्ण और शुक्ल।सामवेद : साम अर्थात रूपांतरण और संगीत। सौम्यता और उपासना। इसमें 1875 (1824) मन्त्र हैं। ऋग्वेद की ही अधिकतर ऋचाएँ हैं। इस संहिता के सभी मन्त्र संगीतमय हैं, गेय हैं। इसमें मुख्य 3 शाखाएँ हैं, 75 ऋचाएँ हैं और विशेषकर संगीतशास्त्र का समावेश किया गया है।अथर्ववेद : थर्व का अर्थ है कंपन और अथर्व का अर्थ अकंपन। ज्ञान से श्रेष्ठ कम करते हुए जो परमात्मा की उपासना में लीन रहता है वही अकंप बुद्धि को प्राप्त होकर मोक्ष धारण करता है। अथर्ववेद में 5987 मन्त्र और 20 कांड हैं। इसमें भी ऋग्वेद की बहुत-सी ऋचाएँ हैं। इसमें रहस्यमय विद्या का वर्णन है।

उक्त सभी में परमात्मा, प्रकृति और आत्मा का विषद वर्णन और स्तुति गान किया गया है। इसके अलावा वेदों में अपने काल के महापुरुषों की महिमा का गुणगान व उक्त काल की सामाजिक, राजनीतिक और भौगोलिक परिस्थिति का वर्णन भी मिलता है।छह वेदांग : (वेदों के छह अंग)- (1) शिक्षा, (2) छन्द, (3) व्याकरण, (4) निरुक्त, (5) ज्योतिष और (6) कल्प।छह उपांग : (1) प्रतिपदसूत्र, (2) अनुपद, (3) छन्दोभाषा (प्रातिशाख्य), (4) धर्मशास्त्र, (5) न्याय तथा (6) वैशेषिक। ये 6 उपांग ग्रन्थ उपलब्ध हैं। इसे ही षड्दर्शन कहते हैं, जो इस तरह है:- सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत।वेदों के उपवेद :ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद और अथर्ववेद का स्थापत्यवेद ये क्रमशः चारों वेदों के उपवेद बतलाए गए हैं।आधुनिक विभाजन :आधुनिक विचारधारा के अनुसार चारों वेदों का विभाजन कुछ इस प्रकार किया गया- (1) याज्ञिक, (2) प्रायोगिक और (3) साहित्यिक।वेदों का सार है उपनिषदें और उपनिषदों का सार 'गीता' को माना है। इस क्रम से वेद, उपनिषद और गीता ही धर्मग्रंथ हैं, दूसरा अन्य कोई नहीं। स्मृतियों में वेद वाक्यों को विस्तृत समझाया गया है। वाल्मिकी रामायण और महाभारत को इतिहास तथा पुराणों को पुरातन इतिहास का ग्रंथ माना है। विद्वानों ने वेद, उपनिषद और गीता के पाठ को ही उचित बताया है।ऋषि और मुनियों को दृष्टा कहा गया है और वेदों को ईश्वर वाक्य। वेद ऋषियों के मन या विचार की उपज नहीं है। ऋषियों ने वह लिखा या कहा जैसा कि उन्होंने पूर्णजाग्रत अवस्था में देखा, सुना और परखा।मनुस्मृति में श्लोक (II.6)के माध्यम से कहा गया है कि वेद ही सर्वोच्च और प्रथम प्राधिकृत है। वेद किसी भी प्रकार के ऊँच-नीच, जात-पात, महिला-पुरुष आदि के भेद को नहीं मानते। ऋग्वेद की ऋचाओं में लगभग 414 ऋषियों के नाम मिलते हैं जिनमें से लगभग 30 नाम महिला ऋषियों के हैं। जन्म के आधार पर जाति का विरोध ऋग्वेद के पुरुष-सुक्त (X.90.12),व श्रीमद्‍भगवत गीता के श्लोक (IV.13), (XVIII.41)में मिलता है।श्लोक : श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोधो यत्र दृश्यते।तत्र श्रौतं प्रमाणन्तु तयोद्वैधे स्मृति‌र्त्वरा॥भावार्थ :अर्थात जहाँ कहीं भी वेदों और दूसरे ग्रंथों में विरोध दिखता हो, वहाँ वेद की बात की मान्य होगी।-वेद व्यासप्रकाश से अधिक गतिशील तत्व अभी खोजा नहीं गया है और न ही मन की गति को मापा गया है। ऋषि-मुनियों ने मन से भी अधिक गतिमान किंतु अविचल का साक्षात्कार किया और उसे 'वेद वाक्य' या 'ब्रह्म वाक्य' बना दिया।।। ॐ ।।

Thursday, 29 October 2015

बच्चों पर नकारात्मक शक्तियों का असर से बचने के उपाये

बच्चों पर नकारात्मक शक्तियों का असर सबसे पहले होता है, क्योंकि उनका मन व मस्तिष्क बड़े लोगों की अपेक्षा बहुत कमजोर होता है। हम देखते हैं कि यदि कोई भी व्यक्ति एकटक बच्चे को देखता है तो बच्चा अनमना सा हो जाता है और रोने लगता है।
ऐसे अनेक कारण हैं जो बच्चों को परेशान करते हैं। इस वजह से बच्चे अक्सर बीमार भी रहते हैं तथा उन्हें भय भी लगता है। कुछ साधारण उपाय कर बच्चों की इन समस्याओं को दूर किया जा सकता है। ये उपाय इस प्रकार हैं-
 

1. आपके बच्चे को बार-बार नजर लगती है तो मंगलवार को एक चांदी के ताबीज में हनुमानजी के चोले का सिंदूर भर लें और इसे काले धागे में डालकर अपने बच्चे के गले में पहना दें। 

2. यदि बच्चे को अंधेरे से या कहीं अकेले जाने से डर लगता है तो शुक्ल पक्ष के किसी भी मंगलवार को श्रीहनुमान चालीसा की पुस्तक लेकर हनुमानजी के मंदिर में अर्पित करें। फिर हनुमानजी के दाएं कंधे के सिंदूर से बच्चे को तिलक लगाकर मूर्ति के सामने लाल आसन पर बैठा दें और हनुमान चालीसा का पाठ 11 बार करें। ऐसा करने से बच्चे का भय जाता रहेगा।

3. यदि आपका बच्चा अक्सर बीमार रहता है तो उपचार के साथ-साथ हनुमानजी का ये उपाय भी कर सकते हैं। शुक्ल पक्ष के पहले मंगलवार को एक अष्टधातु का कड़ा बनवाकर लाएं और इसे हनुमानजी की मूर्ति के सामने रख दें। फिर हनुमानजी के दाएं पैर का सिंदूर कड़े पर लगाकर पंचमुखी श्रीहनुमान कवच, बजरंग बाण, हनुमान बाहुक तथा 11 बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। फिर उस कड़े को अपने बच्चे के दाएं हाथ में पहना दें। साथ ही हनुमानजी से प्रार्थना करें कि बच्चा स्वस्थ रहे।