Saturday, 24 October 2015

संसार ईस्वर की ही माया हे

हम सब अपने पुराने समय को याद करते हैं और कहते हैं कि “मैं पहले बालक था, ऐसे खेलता था, जवानी में मेरे शरीर में बड़ी शक्ति थी, अब बुढ़ापे में मेरा शरीर शक्तिहीन हो गया है.” (मैं) ऐसा सोचने और कहने वाली वाली हमारी आत्मा है. यह आत्मा (मैं) हमारे शरीर में रहते हुए भी हमारे शरीर (मेरे) से  पृथक है. अत: यह स्वत: सिद्ध हो जाता है कि हमें यह शरीर जीवात्मा के रहने भर के लिए मिला है. यह शरीर हमारा स्वरूप नहीं है. यह शरीर हमें भगवत प्राप्ति के लिए ही मिला है. इसी प्रकार ये विषय भी (भोगने की, इस्तेमाल करने की वस्तुएं जैसे घर, पैसा, परिवार आदि) परमात्मा की विशेष अनुकम्पा के कारण हमें शरीर निर्वाह के लिए ही प्राप्त हुए हैं.

जहां तक बन सके विषयों की रमणीयता, विषयासक्ति तथा सुख बोध की इच्छा को छोड़कर आवश्यकता स्वरूप ही इनका (विषयों का) हमें सेवन करना चाहिए. भगवान की माया उनकी शक्ति का ही रूप है और यह संसार उनकी इस माया (शक्ति) से ही चलता है.

Friday, 23 October 2015

शनि को प्रसन्न करने के उपाय

शनि को प्रसन्न करने के उपा इन दिनों शनि देव की चर्चाओं का दौर है क्योंकि विगत 15 नवंबर को शनि कन्या राशि छोड़कर तुला राशि में प्रवेश करेगा। शनि का राशि बदलना ज्योतिष के अनुसार बहुत बड़ी घटना है। इसका हर व्यक्ति पर सीधा पड़ेगा। अत: शनि को प्रसन्न करने के लिए सभी कुछ न कुछ उपाय अवश्य करें।

शनि की प्रसन्नता के लिए कई उपाय बताए जाते हैं लेकिन कुछ ऐसे सटीक उपाय है जिनमें से यदि आप कोई एक भी करते हैं तो शनि की कृपा प्राप्त हो जाती है। ये उपाय बेहद सरल हैं और कोई व्यक्ति आसानी से अपना सकता है।

शनि को प्रसन्न करने के उपाय-
०१:- शनि देव की प्रतिमा पर तेल चढ़ाएं। तेल चढ़ाने से पहले तेल में अपना मुख अवश्य देखें।
०२:- शनि स्तोत्र पाठ करें या मंत्र: ऊं शं शनैश्चराय नम: का जप करें।
०३:- शनि को प्रसन्न करने का सटीक उपाय है हनुमानजी की आराधना। पवनपुत्र के मंदिर में 
        प्रतिदिन या शनि-मंगलवार को हनुमान चालिसा का पाठ करें।
०४:- शनिवार के दिन हनुमानजी के समक्ष तेल का दीपक लगाएं और मंत्र: सीताराम का जप करें।
०५:- शनिवार को शिवलिंग पर दूध और जल अर्पित करें। बिल्वपत्र चढ़ाएं।
०६:- पीपल के पेड़ में जल चढ़ाएं और सात परिक्रमा करें।
०७:- शनिवार के दिन शनि की काली वस्तुओं का दान करें।

इन सात उपायों में से कोई एक उपाय भी यदि आप शनिवार को करते हैं तो निश्चित ही आपको शनि की कृपा प्राप्त होगी। ध्यान रखें शनि बुरे कर्म करने वालों के लिए बहुत क्रूर रूप धारण कर लेते हैं। अत: धार्मिक कार्यों में ध्यान लगाएं और सद्कर्म करें।

किसके पास था कौन-सा दिव्य धनुष, जानिए

किसके पास था कौन-सा दिव्य धनुष, जानिए

किसके पास था कौन-सा दिव्य धनुष, जानिए विश्व के प्राचीनतम साहित्य संहिता और अरण्य ग्रंथों में इंद्र के वज्र और धनुष-बाण का उल्लेख मिलता है। भारत में धनुष-बाण का सबसे ज्यादा महत्व था इसीलिए विद्या के संबंध में एक उपवेद धनुर्वेद है। नीतिप्रकाशिका में मुक्त वर्ग के अंतर्गत 12 प्रकार के शस्त्रों का वर्णन है जिनमें धनुष का स्थान सर्वोपरि माना गया है। कैसे थे प्राचीन अस्त्र-शस्त्र और कौन से, जानिए... भारत में महाभारत काल और उससे पूर्व के काल में एक से एक बढ़कर धनुर्धर हुए हैं। एक ऐसा भी धनुर्धर था जिसको लेकर द्रोणाचार्य चिंतित हो गए थे और एक ऐसा भी धनुर्धर था, जो अपने एक ही बाण से दुश्मन सेना के रथ को कई गज दूर फेंक देता था। धनुर्धर तो बहुत हुए हैं, लेकिन एक ऐसा भी धनुर्धर था जिसकी विद्या से भगवान कृष्ण भी सतर्क हो गए थे। फिर भी इन इन सभी के तीर में था दम लेकिन सर्वश्रेष्ठ तो सर्वश्रेष्ठ ही होता है। कौन है प्राचीन भारत का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर, जानिए रहस्य आखिर भारत में किस तरह धनुष-बाण की शुरुआत हुई और किस तरह एक से एक चमत्कारिक धनुष- बाण के आविष्कार हुए, यह एक रहस्य ही है। महाभारत काल के सभी योद्धाओं के पास विशेष प्रकार के धनुष हुआ करते थे और इनके धनुष-बाण के नाम भी होते हैं। हर एक धनुष के बाण की अपनी एक अलग ही शक्ति होती थी। आओ जानते हैं ऐसे ही 10 धनुष और बाणों के बारे में...

पिनाक (Pinaka) : यह सबसे शक्तिशाली धनुष था। संपूर्ण धर्म, योग और विद्याओं की शुरुआत भगवान शंकर से होती है और उसका अंत भी उन्हीं पर होता है। भगवान शंकर ने इस धनुष से त्रिपुरासुर को मारा था। त्रिपुरासुर अर्थात तीन महाशक्तिशाली और ब्रह्मा से अमरता का वरदान प्राप्त असुर। शिव ने जिस धनुष को बनाया था उसकी टंकार से ही बादल फट जाते थे और पर्वत हिलने लगते थे। ऐसा लगता था मानो भूकंप आ गया हो। यह धनुष बहुत ही शक्तिशाली था। इसी के एक तीर से त्रिपुरासुर की तीनों नगरियों को ध्वस्त कर दिया गया था। इस धनुष का नाम पिनाक था। देवी और देवताओं के काल की समाप्ति के बाद इस धनुष को देवराज इन्द्र को सौंप दिया गया था। उल्लेखनीय है कि राजा दक्ष के यज्ञ में यज्ञ का भाग शिव को नहीं देने के कारण भगवान शंकर बहुत क्रोधित हो गए थे और उन्होंने सभी देवताओं को अपने पिनाक धनुष से नष्ट करने की ठानी। एक टंकार से धरती का वातावरण भयानक हो गया। बड़ी मुश्किल से उनका क्रोध शांत किया गया, तब उन्होंने यह धनुष देवताओं को दे दिया। देवताओं ने राजा जनक के पूर्वज देवराज इन्द्र को दे दिया। राजा जनक के पूर्वजों में निमि के ज्येष्ठ पुत्र देवराज थे। शिव-धनुष उन्हीं की धरोहरस्वरूप राजा जनक के पास सुरक्षित था। इस धनुष को भगवान शंकर ने स्वयं अपने हाथों से बनाया था। उनके इस विशालकाय धनुष को कोई भी उठाने की क्षमता नहीं रखता था, लेकिन भगवान राम ने इसे उठाकर इसकी प्रत्यंचा चढ़ाई और इसे एक झटके में तोड़ दिया।

कोदंड (Kodanda) : एक बार समुद्र पार करने का जब कोई मार्ग नहीं समझ में आया तो भगवान श्रीराम ने समुद्र को अपने तीर से सुखाने की सोची और उन्होंने तरकश से अपना तीर निकाला ही था और प्रत्यंचा पर चढ़ाया ही था कि समुद्र के देवता प्रकट हो गए और उनसे प्रार्थना करने लगे थे। भगवान श्रीराम को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर माना जाता है। हालांकि उन्होंने अपने धनुष और बाण का उपयोग बहुत ‍मुश्किल वक्त में ही किया। देखि राम रिपु दल चलि आवा। बिहसी कठिन कोदण्ड चढ़ावा।। अर्थात शत्रुओं की सेना को निकट आते देखकर श्रीरामचंद्रजी ने हंसकर कठिन धनुष कोदंड को चढ़ाया। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि भगवान राम के धनुष का नाम कोदंड था इसीलिए प्रभु श्रीराम को कोदंड कहा जाता था। 'कोदंड' का अर्थ होता है बांस से निर्मित। कोदंड एक चमत्कारिक धनुष था जिसे हर कोई धारण नहीं कर सकता था। कोदंड नाम से भिलाई में एक राम मंदिर भी है जिसे 'कोदंड रामालयम मंदिर' कहा जाता है। भगवान श्रीराम दंडकारण्य में 10 वर्ष तक भील और आदिवासियों के बीच रहे थे। कोदंड एक ऐसा धनुष था जिसका छोड़ा गया बाण लक्ष्य को भेदकर ही वापस आता था। एक बार की बात है कि देवराज इन्द्र के पुत्र जयंत ने श्रीराम की शक्ति को चुनौती देने के उद्देश्य से अहंकारवश कौवे का रूप धारण किया व सीताजी को पैर में चोंच मारकर लहू बहाकर भागने लगा। तुलसीदासजी लिखते हैं कि जैसे मंदबुद्धि चींटी समुद्र की थाह पाना चाहती हो उसी प्रकार से उसका अहंकार बढ़ गया था और इस अहंकार के कारण वह- ।।सीता चरण चोंच हतिभागा। मूढ़ मंद मति कारन कागा।। ।।चला रुधिर रघुनायक जाना। सीक धनुष सायक संधाना।। वह मूढ़ मंदबुद्धि जयंत कौवे के रूप में सीताजी के चरणों में चोंच मारकर भाग गया। जब रक्त बह चला तो रघुनाथजी ने जाना और धनुष पर तीर चढ़ाकर संधान किया। अब तो जयंत जान बचाने के लिए भागने लगा। वह अपना असली रूप धरकर पिता इन्द्र के पास गया, पर इन्द्र ने भी उसे श्रीराम का विरोधी जानकर अपने पास नहीं रखा। तब उसके हृदय में निराशा से भय उत्पन्न हो गया और वह भयभीत होकर भागता फिरा, लेकिन किसी ने भी उसको शरण नहीं दी, क्योंकि रामजी के द्रोही को कौन हाथ लगाए? जब नारदजी ने जयंत को भयभीत और व्याकुल देखा तो उन्होंने कहा कि अब तो तुम्हें प्रभु श्रीराम ही बचा सकते हैं। उन्हीं की शरण में जाओ। तब जयंत ने पुकारकर कहा- 'हे शरणागत के हितकारी, मेरी रक्षा कीजिए प्रभु श्रीराम।'

शारंग (sarang) : भगवान श्रीकृष्ण सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर भी थे यह बात तब पता चली, जब उन्होंने लक्ष्मणा को प्राप्त करने के लिए स्वयंवर की धनुष प्रतियोगिता में भाग लिया था। इस प्रतियोगिता में कर्ण, अर्जुन और अन्य कई सर्वश्रेष्ठ धनुर्धरों ने भाग लिया था। द्रौपदी स्वयंवर से कहीं अधिक कठिन थी लक्ष्मणा स्वयंवर की प्रतियोगिता। भगवान श्रीकृष्ण ने सभी धनुर्धरों को पछाड़कर लक्ष्मणा से विवाह किया था। हालांकि लक्ष्मणा पहले से ही श्रीकृष्ण को अपना पति मान चुकी थी इसीलिए श्रीकृष्ण को इस प्रतियोगिता में भाग लेना पड़ा। श्रीकृष्ण के धनुष का नाम 'शारंग' था। शारंग का अर्थ होता है रंगा हुआ, रंगदार, सभी रंगोंवाला और सुंदर। कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण का यह धनुष सींग से बना हुआ था। हालांकि कुछ मानते हैं कि यह वही सारंग है जिसे कण्व की तपस्यास्थली के बांस से बनाया गया था।

गाण्डीव (gandiva) : पांच पांडवों में से एक अर्जुन की धनुष विद्या भी जगप्रसिद्ध थी। गुरु द्रोण के श्रेष्ठ शिष्यों में से एक थे अर्जुन। द्रोण ने अर्जुन को धनुष सिखाते वक्त वचन दिया था कि तुमसे श्रेष्ठ इस संसार में कोई धनुर्धर नहीं होगा। अर्जुन के धनुष की टंकार से पूरा युद्ध क्षेत्र गूंज उठता था। रथ पर सवार कृष्ण और अर्जुन को देखने के लिए देवता भी स्वर्ग से उतर गए थे। अर्जुन के धनुष का नाम गाण्डीव था। कहते हैं कि कण्व ऋषि कठोर तप कर रहे थे। तपस्या के दौरान उनका शरीर दीमक द्वारा बांबी बना दिया गया था। बांबी और उसके आसपास की मिट्टी के ढेर पर सुंदर गठीले बांस उग आए थे। जब कण्व ऋषि की तपस्या पूर्ण हुई, तब तब ब्रह्माजी प्रकट हुए। उन्होंने उन्हें अनेक वरदान दिए और जब जाने लगे तो ध्यान आया कि कण्व की मूर्धा पर उगे हुए बांस कोई सामान्य नहीं हो सकते तथा इसका सदुपयोग करना चाहिए। तब ब्रह्माजी ने उसे काटकर विश्वकर्मा को दे दिया और विश्वकर्मा ने उससे 3 धनुष बनाए- 1. पिनाक, शार्ङग और गाण्डीव। इन तीनों धनुषों को ब्रह्माजी ने भगवान शंकर को समर्पित कर दिया। इसे भगवान शंकर ने इन्द्र को दे दिया। इस तरह इंद्र के पास पिनाक धनुष फिर परशुराम और फिर बाद में राजा जनक के पास पहुंच गया लेकिन गा‍ण्डीव वरुणदेव के पास पहुंच गया। वरुणदेव से यह धनुष अग्निदेव के पास और ‍अग्निदेव से यह धनुष अर्जुन ने ले लिया था।

विजय : वैसे तो महाभारत काल में सैकड़ों योद्धा हुए हैं, लेकिन कहते हैं कि युद्ध में कर्ण जैसा कोई धनुर्धर नहीं था। कवच और कुंडल नहीं उतरवाते तो कर्ण को मारना असंभव था। कर्ण के अर्जुन और एकलव्य से श्रेष्ठ धनुर्धर होने का प्रमाण यह है कि कर्ण के तीर में इतनी ताकत थी कि जब वे तीर चलाते थे और उनका तीर अर्जुन के रथ पर लग जाता था तो रथ पीछे कुछ दूरी तक खिसक जाता था। कृष्ण अर्जुन से कहते थे कि जिस रथ पर मैं और हनुमान विराजमान हैं उसके इस तरह पीछे धकेले जाने से पता चलता है कि कर्ण की धनुर्विद्या में बहुत बल है। कर्ण के धनुष का नाम विजय था। भगवान परशुराम ने कर्ण को अपना विजय नामक धनुष प्रदान किया था और उसे ये आशीर्वाद दिया था कि तुम्हारी अमिट प्रसिद्धि रहेगी। विजय एक ऐसा धनुष था कि किसी भी प्रकार के अस्त्र या शस्त्र से खंडित नहीं हो सकता था। इससे तीर छुटते ही भयानक ध्वनि उत्पन्न होती थी। शार्ङग : यह धनुष भगवान विष्णु के पास था। इस धनुष की उत्पत्ति का जिक्र हम ऊपर कर आए हैं। इसके अलावा अजगव और वैष्णव नामक धनुष भी दिव्य थे। कौटिल्य ने 4 प्रकार के धनुषों का वर्णन किया है- 1. पनई से निर्मित कार्मुक, 2. बांस से निर्मित कोदंड, 3. डार्नवुड का बना द्रुण और 4. हड्डी या सींग से बना धनुष।

विष्णु-विष्णु बाण को धनुष द्वारा चलाया जाता है। जिसमें बाण रखा जाता है उसे तुणीक कहा जाता है, ‍जो पीछे कंधे पर बंधा होता है जबकि धनुष को कंधे पर धारण करते हैं। परशुराम इस धरती पर ऐसे महापुरुष हुए हैं, जो पूर्ण रूप से धनुर्विद्या में पारंगत थे और जिनकी जोड़ का कोई दूसरा नहीं था। पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य और खुद कर्ण ने भी परशुराम से ही धनुर्विद्या की शिक्षा ली थी। शास्त्रों के अनुसार 4 वेद हैं और तरह 4 उपवेद हैं। इन उपवेदों में पहला आयुर्वेद है। दूसरा शिल्प वेद है। तीसरा गंधर्व वेद और चौथा धनुर्वेद है। इस धनुर्वेद में धनुर्विद्या का सारा रहस्य मौजूद है।

Tuesday, 20 October 2015

स्वाहा - अग्निदेव की पत्नी

स्वाहा - अग्निदेव की पत्नी

यज्ञ आदि अनुष्ठान में हवन करते समय देवताओं के नाम की आहुति देने का विधान है।कहते हैं कि देवताओं की पुष्टि यज्ञों में अर्पित आहुतियों से ही होती है। इसलिए जब भी असुरों ने देवताओं को पराजित किया, उन्होंने यज्ञों का भी विध्वंस किया ताकि देवताओं की शक्ति क्षीण हों। पुराणों के अनुसार,यज्ञ की अग्नि के माध्यम से भेजी गई आहुतियां देवताओं तक अवश्य पहुंचती हैं और इसका माध्यम बनती है स्वाहा। यज्ञ की प्रज्वलित अग्नि में मंत्रोच्चारण के साथ ‘स्वाहा’ बोलते हुएयज्ञ सामग्री और घी की आहुतियां दी जाती हैं। क्या आपको मालूम है कि स्वाहा का उच्चारण बार-बार क्यों किया जाता है?स्वाहा शब्द का अर्थ है सु+आ+हा यानी अच्छे लोगों को दिया गया। श्रीमद्भागवत एवं शिवपुराण के अनुसार दक्ष प्रजापति की पुत्री स्वाहा का विवाह अग्नि देवता के साथ हुआ था। अग्नि अपनी पत्नी स्वाहा द्वारा ही भोजन ग्रहण करते हैं।इसीलिए स्वाहा बोलकर उनके माध्यम से अग्नि को हविष्य भेंट करने का विधान है। विभिन्न देवी-देवताओं के नाम के बाद स्वाहा का उच्चारण किया जाता है, ताकि अग्निदेव तक आहुतियां पहुंचें और फिर अग्निदेव उसे विभिन्न देवताओं तकपहुंचाएं।

विजय दशमी पर शमी पूजन का महत्व जानिये

शमी पूजन का महत्व : अमंगल का हरण करता है शमी

भारतीय परंपरा में विजयादशमी पर शमी पूजन का पौराणिक महत्व रहा है। जन मानस में विजयादशमी "दशहरा" के नाम से भी प्रचलित है। श्रद्धालुओं द्वारा दशहरा पर सायंकाल शमी वृक्ष का पूजन कर उससे आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। इस परंपरा के पीछे शमी वृक्ष का महत्व छुपा है। आश्विन माह के दशहरे के दिन अपराह्न को शमी वृक्ष के पूजन की परंपरा विशेष कर क्षत्रिय व राजाओं में रही है। आज भी यह परंपरा कायम है। कहते हैं कि ऎसा करने से मानव पवित्र हो जाता है। इसके लिए घर या गांव के ईशान कोण (पूर्वोत्तर) में स्थित शमी का वृक्ष विशेष लाभकारी माना गया है। 
दशहरे के दिन शमी वृक्ष का पूजन अर्चन व प्रार्थना करने के बाद जल और अक्षत के साथ वृक्ष की जड से मिट्टी लेकर गायन-वादन और घोष के साथ अपने घर आने के निर्देश हैं। शमी पूजा के कई महत्वपूर्ण मंत्र भी हैं जिनका उच्चारण किया जाता है। इन मंत्रों में भी अमंगलों और दुष्कृत्य का शमन करने, दुस्वप्नों का नाश करने वाली, धन देने वाली, शुभ करने वाली शमी के प्रति पूजा अर्पित करने की बात कही गई है। कहते हैं कि लंका पर विजय पाने के बाद राम ने भी शमी पूजन किया था। नवरात्र में मां दुर्गा की पूजा भी शमी वृक्ष के पत्तों से करने का शास्त्र में विधान है। 
इस दिन शाम को वृक्ष का पूजन करने से आरोग्य व धन की प्राप्त होती है। दशहरे पर शमी के वृक्ष की पूजन परंपरा हमारे यहां प्राचीन समय से चली आ रही है। ऎसी मान्यता है कि मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्रीराम ने लंका पर आRमण करने के पूर्व शमी वृक्ष के सामने शिश नवाकर अपनी विजय हेतु प्रार्थना की थी। महाभारत के संदर्भ से पता चलता है कि पांडवों ने देश निकाला के अंतिम वर्ष में अपने हथियार शमी के वृक्ष में ही छिपाए थे। संभवत: इन्हीं दो कारणों से शमी पूजन की परंपरा प्रारंभ हुई होगी। शमी वृक्ष तेजस्विता एवं दृढता का प्रतीक भी माना गया है, जिसमें अगि्न तत्व की प्रचुरता होती है। इसी कारण यज्ञ में अगि्न प्रकट करने हेतु शमी की लकडी के उपकरण बनाए जाते हैं। आयुर्वेदिक दृष्टि में तो यह अत्यंत गुणकारी औषधि मानी जाती है।
शमी वृक्ष के संदर्भ में कई पौराणिक कथाओं का आधार विद्यमान है। यज्ञ परंपरा में शमी के पत्तों का हवन गुणकारी माना गया है। शमी का पेड (प्रोसोपिस सिनरेरिया) 8-10 मीटर ऊंचा होता है। शाखाओं पर कांटे होते हैं। पत्तियां द्विपक्षवत होती हैं। शमी के फूल छोटे पीताभ रंग के होते हैं। प्रौढ पत्तियों का रंग राख जैसा होता है इसीलिए इसकी प्रजाति का नाम सिनरेरिया रखा गया है अर्थात् राख जैसा।

Monday, 19 October 2015

सीता हरण के अलाबा और किन बजह से मारा गया दशानन जाने

श्री राम के वंशज राजा अनरण्य के राज्य में रावण अपना अधिकार करना चाहता था। जिसके कारण दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ। ब्रह्मा जी के वरदान के कारण अनरण्य हार गए और रावण उनका अपमान करने लगा। जिससे त्रस्त होकर अनरण्य ने रावण को शाप दिया कि मेरे वंशज दशरथ का पुत्र तुम्हारा काल बनेगा। उसी के हाथों तुम्हारी मृत्यु लिखी है।रावण नही चाहता था कि उससे अधिक कोई बलवान हो या फिर कही शांति हो। इसी कारण उसनेवो तपस्या कर रहे कई ऋष‌ियों का वध कर दिया। जिसके कारण उन ऋष‌ियों ने यह शाप दिया कि हमारा शरीर से निकला हुआ रक्त और इस मिट्टी से ही तुम्हारी म़त्यु होगी। इसी शाप के कारण सीता मां का जन्म धरती से ही हुआ था।कुबेर की पुत्रवधु रंभा के साथ रावण ने दुराचार किया। जिसके कारण रंभा ने रावण को शाप दिया कि जिस स्त्री को तुम उसकी इच्छा के खिलाफ जाकर छुना चाहोगे। वही स्त्री तेरी मैत का कारण बनेगी। इसी कारण सीता मां उसका मृत्यु का कारण बनी।

दशानन का नाम रावण कैसे पड़ा जाने


क्वांर नवरात्रि के प्रारंभ होते ही हम प्रतिवर्ष लंकाधिपति रावण के वध की तैयारी में जुट जाते है। धर्म की विजय का प्रतीक पर्व दशहरा प्रत्येक हिंदू धर्मावलंबी को चेतना और आत्म विश्वास से परिपूर्ण करता रहा है। सवाल यह उठता है कि क्या महज सीता का अपहरण ही रावण के अंत का कारण बना? या फिर इस पर्व को मनाये जाने का और भी कोई कारण है? जहां तक बात की जाये धर्म ग्रंथों की तो उनमें मिलने वाली वर्णन सीता हरण को ही राम-रावण युद्ध का मुख्य कारण बताते है। यदि सीता हरण को भगवान राम ने अपनी अस्मिता और सीता के अपमान से जोड़ कर देखा, तथा रावण के वध का निश्चय किया, तो आज पूरी दुनिया में अपहरण और नारी का अपमान सामान्य घटना बनी हुयी है। साथ ही यदि कोई पति अपनी पत्नि के अपहरण के जुर्म में किसी आरोपी को जान से मार दे तो खुशी में दीवाली नहीं मनायी जाती वरन उस पति को आजीवन कारावास अथवा फांसी की सजा तक दी जा सकती है। जिस रावण को प्रभु राम द्वारा मारा गया, वह वास्तव में घमंड का पुतला था। लंकाधिपति रावण अपना जीवन मरण पहले से ही जान चुका था, ज्योतिष विद्या में पारंगत दशानन को अपने पूर्व जन्म की भूल और उसके पश्चाताप का भी पूर्ण ज्ञान था। रावण को कदम कदम पर श्रापित किये जाने का वर्णन भी दुर्लभ ग्रंथ रावण संहिता में मिलता है।

शिवगण नंदीश्वर ने दिया रावण को श्राप
महा अहंकारी और शास्त्रों वेदों के ज्ञाता रावण को श्रापित होने के कारण ही प्रभु राम के हाथों मृत्यु प्राप्ति हुयी। रावण संहिता बताती है कि अपने भाई कुबेर से पुष्पक विमान बल पूर्वक छीनने के बाद रावण उस पर सवार होकर आकाश मार्ग से वनों का आनंद लेते हुये सैर करने लगा। इसी मार्ग पर उसने सुंदर पर्वत से घिरे वनाच्छादित और मनोरम स्थल को देखकर उस स्थान में प्रवेश करना चाहा। वह पर्वत कोई सामान्य पर्वत नहीं, बल्कि भगवान शंकर का कैलाश पर्वत था। रावण को वहां प्रवेश करते देख शिवगणों ने उन्हें ऐसा करने से मना दिया, किंतु रावण के न मानने पर नंदीश्वर ने रावण को समझाते हुये कहा हे दशग्रीव तुम यहां से लौट जाये, इस पर्वत पर भगवान शंकर क्रीड़ा कर रहे है। गरूड़, नाग, यक्ष, देव, गंधर्व तथा राक्षसों का प्रवेश यहां निषिद्ध कर दिया गया है

नंदीश्वर के द्वारा कहे इन शब्दों से रावण तमतमा उठा और उसके कानों के कुंडल हिलने लगे। क्रोध के कारण उसकी आंखे अंगारे बरसाने लगी। वह पुष्पक विमान से उतरकर गुस्से में गुर्राते हुये पूछने लगा यह शंकर कौन है? कहते हुये पर्वत के मूल भाग में जा पहुंचा। रावण ने देखा कि भगवान शंकर के निकट ही चमकते हुये शूल केा हाथ में लिये नंदीश्वर दूसरे शिव के समान खड़े हुये है। उनके वानर जैसे मुख को देखकर रावण ने अवज्ञा करते हुये जलपूर्ण बादल की तरह गरजते हुये हंसना आरंभ कर दिया। तब भगवान शंकर के द्वितीय रूप नंदी ने क्रुद्ध होकर समीप खड़े दशानन को श्राप देते हुये कहा कि तुने मेरे जिस वानर रूप की अवज्ञा की है (मजाक उड़ाया है) उसी रूप वाले मेरे जैसे शक्तिशाली तथा तेजस्वी वानर तेरे कुल का वध करने के लिये उत्पन्न होंगे। वे चलते फिरते पर्वतों के सामान वृहदाकार होंगे। वे तेरे प्रबल दर्प को चूर चूर कर देने वाले होंगें तथा तेरे विशालकाय शरीर को तुच्छ बनाते हुये तेरे मंत्रियों तथा पुत्रों का वध कर डालेंगे। नंदी ने अत्यंत क्रोधित होते हुये यह भी कहा कि मैं तुझे अभी मार डालने की शक्ति रखता हूं, किंतु मारूंगा नहीं, क्योंकि अपने कुकर्मों के कारण तु तो पहले ही मरे हुये जैसा है।

दशानन को भगवान शिव ने दिया रावण नाम
शिवगण नंदी से वार्तालाप और श्रापित होने के बाद राक्षस राज रावण ने पर्वत के समीप खड़े होकर अत्यंत क्रोधित स्वर में कहा कि जिसने मेरी यात्रा के दौरान मेरे पुष्पक विमान को रोकने की चेष्टा की है मैं उस पर्वत को ही जड़ से उखाड़ फेंकूंगा। शंकर किस आधार से इस पर्वत पर क्रीड़ा करते है, उन्हें मालूम होना चाहिये कि अब उनके लिये मैं भय का कारण बनकर उपस्थित हूं। इतना कहकर रावण ने पर्वत को अपने हाथों में उठा लेना चाहा और शक्ति लगाते हुये दहाड़ उठा, जिससे वह पर्वत हिलने लगा। रावण की इस क्रिया से संपूर्ण शिव लोक में हड़कंप मच गया। स्वयं पार्वती जी भगवान शंकर से लिपट पड़ी। ऐसी स्थिति देख भगवान शंकर ने अपने पैर के अंगूठे द्वारा उस पर्वत को दबा दिया। शंकर जी के पैर का दबाव पड़ते ही पर्वत के जैसी रावण की भुजायें नीचे दब गयी। इससे राक्षस राज रावण दर्द से कराह उठा और जोर से आर्तनाद करने लगा। जिससे तीनों लोक कांप उठे। सभी ओर हाहाकार मच गया। रावण को मुसीबत में उसके मंत्रियों ने कहा, हे महाराज आपको इस दर्द से भगवान शंकर ही छुटकारा दिला सकते है। आप उनकी शरण में जाये। इस प्रकार रावण ने मंत्रियेां की बात मानकर वृषभध्वज शिवजी को प्रसन्न करने के लिये सामवेदोक्त स्त्रोतों द्वारा उनकी स्तुति करने लगा और दर्द से कराहते हुये एक हजार वर्ष तक स्तुति करता रहा। भगवान शिव ने प्रकट होकर रावण के भुजाओं को मुक्त करते हुये कहा। हे दशानन तुम वीर हो, मैं तुमसे प्रसन्न हो। पर्वत में दब जाने से तुमने जो दारूण राव (आर्तनाद) किया था, और जिससे भयभीत होकर तीनों लोकों के प्राणी रो उठे थे, उसी के कारण तुम रावण नाम से प्रसिद्ध होओगे।