Wednesday, 18 May 2016

ज्ञान से बड़ा चरित्र व ज्योतिष द्रष्टि से ग्रहो का प्रभाव

🌺 ज्ञान से बड़ा चरित्र व ज्योतिष द्रष्टि से ग्रहो का प्रभाव🌺

एक राजपुरोहित अनेक विद्याओँ के ज्ञाता होने के कारण राज्य में बहुत प्रतिष्ठित थे । बड़े बड़े विद्वान् और स्वयं राज्य के राजा भी राजदरबार में राजपुरोहित के आते ही उठकर उन्हें आसन प्रदान करते थे ।
एक बार राजपुरोहित के मन में जिज्ञासा हुई ..इतना सम्मान उन्हें अपने ज्ञान के कारण मिलता है या ..अपने शुद्धः चरित्र के कारण....?
एक दिन राजदरबार से लौटते समय राजपुरोहित राजा का खजाना देखने गए और उस खजाने से राजपुरोहित ने पांच बहुमूल्य मोती उठा लिए ....राजपुरोहित के इस कार्य को देखकर उस खजाने के खजांची जो उस समय वही था को बहुत आश्चर्य हुआ ।
दूसरे दिन भी राजपुरोहित ने राजदरबार से लौटते समय राजा के खजाने से पाच बहुमूल्य मोती फिर उठा लिए यह देखकर ..खंजाची के मन में जो सम्मान का भाव था राजपुरोहित के प्रति वोह क्षीण हो गया ।
तीसरे दिन भी राजपुरोहित ने राजदरबार से लौटे समय खजाने से पाच बहुमूल्य मोती फिर उठा लिए ...अब तो खजांची का धैर्य जवाब दे गया उसने इस बात कि जानकारी राजा को दे दी ....राजा को भी राजपुरोहित के इस कार्य से बड़ा आघात लगा और राजा के नजरोँ में राजपुरोहित कि जो प्रतिष्ठा थी बिखर गयी ।
चौथे दिन जब राजपुरोहित राजदरबार में आये तो राजा ने उठकर ना उन्हें अभिवादन किया और ना आसन प्रदान किया । राजपुरोहित समज गया कि राजा को सब ज्ञात हो चुका है ....राजसभा कि समाप्ति के बाद राजा ने सभी सभा सदोँ के जाने के बाद एकांत में राजपुरोहित से पूछा क्या आपने हमारे खजाने से बहुमूल्य मोती उठाये है ?..राजपुरोहित ने स्वीकार किया ..जी महाराज मैंने पंद्रह बहुमूल्य मोती खजाने से उठाये है ...यह सुनकर राजा को बहुत क्रोध आया ..दुःख और आश्चर्य के साथ राजा ने कहा ...आपने ऐसा कार्य करके अपने जीवन भर कि प्रतिष्ठा खो दी ....आपने ऐसा क्यों किया ?
राजपुरोहित ने मुस्कुराकर और शांति के साथ ये जवाब दिया ...राजन. । केवल इस बात कि परीक्षा लेने हेतु कि ज्ञान और चरित्र में से कौन बड़ा है ..मैंने आपके खजाने से बहुमूल्य मोती उठाये थे .....आज ज्ञात हुआ ..मेरा सम्मान ज्ञान से ज्यादा चरित्र के कारण है ...आज चरित्र के प्रति मेरी आस्था और बढ़ गयी है । यह सुनकर राजा का क्रोध शांत हो गया ।
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प्रिय मित्रों ...यदि हम डॉक्टर है .. इंजीनीअर है..किसी अच्छे पद पर प्रतिष्ठित है ..या सफल व्यवसायी है ...ये बात बहुत अच्छी है ..पर यदि हमारा चरित्र भी उत्तम है ..तो सोने पर सुहागे वाली बात है ।
हमारा चरित्र कुछ गुणो से मिलकर बनता है जैसे :-
हम बहुत सकारात्मक सोच के धनि है (हर विपरीत परिस्थिति में )
ईमानदारी (रिश्तो और अपने कार्य क्षेत्र के प्रति ) या लॉयल्टी कह सकते है
सत्यता और वचन बद्धता ...उत्तम व्यवहार ...और हेल्पिंग नेचर ..(उस समय जब कोई व्यक्ति विपरीत परिस्थितियो में घिरा हो)
साहस ..धैर्य ...नारी के प्रति सम्मान .. परिश्रमिता ..आदि और भी
हमारे चरित्र में कोई भी उपरोक्त एक गुण भी शुद्ध रूप में होना चाहिए ...जैसे यदि हम ईमानदार या लोयल है तो हर क्षेत्र में रहिये ..रिश्तो में ..अपने कार्य क्षेत्र में और हर परिस्थिति में ईमानदार होना चाहिए यही चरित्र कि शुद्धता है ।
कोई भी एक गुण यदि हम में शुद्ध रूप में है तो बाकी सभी गुण हममे खुद -बा -खुद ..आ जाते है

ज्योतिष दृष्टि :-

ज्योतिषीय दृष्टि से देखे तो इन् गुणो को धारण करने पर सभी ग्रह खुद -बा-खुद ठीक हो जाते है
जैसे :-

सूर्य :-

हम वचन बद्धः है तो सूर्य ..ठीक होता है

मंगल :-

साहसी और उदार है ..तो मंगल

बुध चन्द्र

मधुर वाणी और व्यवहार के धनि है तो  । चन्द्र और बुध

शुक्र गुरु

नारी के और बड़ो या अपने से श्रेष्ठ के प्रति सम्मान कि भावना है तो ....शुक्र और गुरु ठीक होते है

शनि राहु केतु :-

परिश्रमी और निर्व्यसनी है..तो शनि खुद-बा -खुद ठीक हो जाता है

तो इस प्रकार अच्छा चरित्र ही हमारे सुख और समृद्धि का रहस्य है ।

Wednesday, 13 January 2016

भक्त का प्रेम

* विशुद्ध प्रेम *

इस कथा को एक बार जरुर पढें और यदि आवश्यक समझें तो आगे भी भेजें।

प्रभु श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ बहुत-सी लीलायें की हैं।

श्री कृष्ण गोपियों की मटकी फोड़ते और माखन चुराते और गोपियाँ श्री कृष्ण का उलाहना लेकर यशोदा मैया के पास जातीं, ऐसा बहुत बार हुआ।

एक बार की बात है कि यशोदा मैया प्रभु श्री कृष्ण के उलाहनों से तंग आ गयीं और छड़ी लेकर श्री कृष्ण की ओर दौड़ी।

जब प्रभु ने अपनी मैया को क्रोध में देखा तो वह अपना बचाव करने के लिए भागने लगे।

भागते-भागते श्री कृष्ण एक कुम्भार के पास पहुँचे।

कुम्भार तो अपने मिट्टी के घड़े बनाने में व्यस्त था, लेकिन जैसे ही कुम्भार ने श्री कृष्ण को देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुआ।

कुम्भार जानता था कि श्री कृष्ण साक्षात् परमेश्वर हैं।

तब प्रभु ने कुम्भार से कहा कि:- 'कुम्भार जी, आज मेरी मैया मुझ पर बहुत क्रोधित है।
मैया छड़ी लेकर मेरे पीछे आ रही है, भैया, मुझे कहीं छुपा लो।'

तब कुम्भार ने श्री कृष्ण को एक बडे से मटके के नीचे छिपा दिया।

कुछ ही क्षणों में मैया यशोदा भी वहाँ आ गयीं और कुम्भार से पूछने लगी:- 'क्यूँ रे कुम्भार, तूने मेरे कन्हैया को कहीं देखा है क्या?'

कुम्भार ने कह दिया:- 'नहीं मैया, मैंने कन्हैया को नहीं देखा।'

श्री कृष्ण ये सब बातें बडे से घड़े के नीचे छुपकर सुन रहे थे।

मैया तो वहाँ से चली गयीं...

अब प्रभु श्री कृष्ण कुम्भार से कहते हैं:- 'कुम्भार जी, यदि मैया चली गयी हो तो मुझे इस घड़े से बाहर निकालो।'

कुम्भार बोला:- 'ऐसे नहीं प्रभु जी, पहले मुझे चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो।'

भगवान मुस्कुराये और कहा:- 'ठीक है, मैं तुम्हें चौरासी लाख योनियों से मुक्त करने का वचन देता हूँ, अब तो मुझे बाहर निकाल दो।'

कुम्भार कहने लगा:- 'मुझे अकेले नहीं प्रभु जी, मेरे परिवार के सभी लोगों को भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दोगे तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकालूँगा।'

प्रभु जी कहते हैं:- 'चलो ठीक है, उनको भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त होने का मैं वचन देता हूँ, अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो।'

अब कुम्भार कहता है:- 'बस प्रभु जी, एक विनती और है, उसे भी पूरा करने का वचन दे दो तो मैं आपको घड़े से बाहर निकाल दूँगा।'

भगवान बोले:- 'वो भी बता दे, क्या कहना चाहते हो?'

कुम्भार कहने लगा:- 'प्रभु जी, जिस घड़े के नीचे आप छुपे हो, उसकी मिट्टी मेरे बैलों के ऊपर लाद के लायी गयी है।
मेरे इन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो।'

भगवान ने कुम्भार के प्रेम पर प्रसन्न होकर उन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त होने का वचन दिया।'

प्रभु बोले:- 'अब तो तुम्हारी सब इच्छा पूरी हो गयी, अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो।'

तब कुम्भार कहता है:- 'अभी नहीं भगवन, बस एक अन्तिम इच्छा और है, उसे भी पूरा कर दीजिये, और वो ये है - जो भी प्राणी हम दोनों के बीच के इस संवाद को सुनेगा, उसे भी आप चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करोगे।

बस यह वचन दे दो तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकाल दूँगा।'

कुम्भार की प्रेम भरी बातों को सुन कर प्रभु श्रीकृष्ण बहुत खुश हुए और कुम्भार की इस इच्छा को भी पूरा करने का वचन दिया।

फिर कुम्भार ने बाल श्री कृष्ण को घड़े से बाहर निकाल दिया।

उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया, प्रभु जी के चरण धोये और चरणामृत पीया, अपनी पूरी झोंपड़ी में चरणामृत का छिड़काव किया और प्रभु जी के गले लगकर इतना रोये क़ि प्रभु में ही विलीन हो गये।

जरा सोच करके देखिये, जो बाल श्री कृष्ण सात कोस लम्बे-चौड़े गोवर्धन पर्वत को अपनी इक्क्नी अंगुली पर उठा सकते हैं, तो क्या वो एक घड़ा नहीं उठा सकते थे।

लेकिन बिना प्रेम रीझे नहीं नटवर नन्द किशोर.....

कोई कितने भी यज्ञ करे, अनुष्ठान करे, कितना भी दान करे, चाहे कितनी भी भक्ति करे, लेकिन जब तक मन में प्राणी मात्र के लिए प्रेम नहीं होगा, प्रभु श्री कृष्ण मिल नहीं सकते।

'हरि व्यापक सर्वत्र समाना, प्रेम से प्रकट होई मैं जाना'

'मोहन प्रेम बिना नहीं मिलता, चाहे कोई कर ल्यो कोटि उपाय।'

करोड़ों उपाय भी चाहे कोई कर लो तो प्रभु को प्रेम के बिना कोई पा नहीं सकता।

'प्रेम परिचय को पहचान बना देता है, प्रेम वीराने को गुलिस्तान बना देता है।

मैं आप बीती कहती हूँ - गैरों की नहीं, प्रेम इन्सान को भगवान बना देता है॥'

जय श्री कृष्ण जी.......l

Tuesday, 12 January 2016

कैसे हम भगवान तक पहुंच सकते हैं

कैसे हम भगवान तक पहुंच सकते है

आप.आप किसी को कहिये कि भाई भक्ति कीजिये.प्रभु की भक्ति करने के लिए ही तो मनुष्य जीवन मिला है.तो आप जानते हैं कि लोग क्या कहते हैं.कह देते हैं की अरे भाई अभी तो बहुत काम है,बच्चों को पालना है,पोसना है,नौकरी करनी है.इतने busy हैं हम.time कहाँ है जो भक्ति करे.कुछ तो ये भी कह देते हैं कि भक्ति करना तो बेकार लोगों का काम है.हमारे पास तो बहुत काम है.कुछ लोग कहते हैं कि जब free हो जायेंगे तब भगवान के बारे में सोचेंगे.अभी तो बहुत व्यस्त हैं.

भगवान जानते हैं कि इंसान उन तक न आने के लिए बहुत बहाने बनाता है.इसीलिए तो भगवान कहते हैं :

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्‌ ॥(भगवद्गीता,8.7)

अर्थात्

हे अर्जुन!तुम्हे सदैव कृष्ण रूप में मेरा चिंतन करना चाहिए और साथ ही युद्ध करने के कर्त्तव्य को भी पूरा करना चाहिए.अपने कर्मों को मुझे समर्पित करके तथा अपने मन एवं बुद्धि को मुझमे स्थिर करके तुम निश्चित रूप से मुझे प्राप्त कर सकोगे.

तो भगवान देखिये यहाँ कितना सुन्दर तरीका आपको बता रहे हैं.कैसे आप भक्ति में रहे.कैसे आप भगवान का ध्यान करे.कईबार लोग मुझसे पूछते हैं कि हम कभी मंदिर नही जाते,हम पूजा-पाठ नही करते तो इसका मतलब क्या हम पापी हैं?भगवान ने देखिये यहाँ नही कहा है कि आप मेरे दरवाजे पर आईये,मेरे दर पर आईये.भगवान ने कहा है कि जहाँ भी आप हैं,जो कुछ कर रहे हैं करते रहिये.किसी चीज को छोडने की जरूरत नही है.कुछ मत छोडिये लेकिन मेरा चिंतन अवश्य कीजिये.कैसे ,सर्वेषु कालेषु,हर वक्त,हर समय,हर पल,हर क्षण मेरा स्मरण करते रहिये.

तो भगवान ने बहुत सुन्दर नुस्खा बताया है कि कैसे हम भगवान तक पहुंच सकते हैं,भगवान को याद करके.है न.भगवान को याद करना बहुत सहज है.बहुत ही सहज है.लेकिन इसके लिए हमें ये याद रखना होगा कि भगवान से हमारा संबंध क्या है?अगर आपको कोई संबंध नजर नही आता तो आप कोई संबंध बना लीजिए.कोई संबंध जोड़ लीजिए.फिर उस संबंध को पोषित कीजिये.धीरे-धीरे,धीरे-धीरे आप उस संबंध के आदी हो जायेंगे और जब वो संबंध आप भगवान से अच्छी तरह से जोड़ लेंगे तब आपको आदत हो जायेगी भगवान के बारे में सोचने की.यही तरीका है जिससे आप हर समय,हर क्षण भक्ति कर सकते हैं और आपका समय भी जाया नही होगा.

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कार्यक्रम समर्पण में आपके साथ हूँ मै प्रेमधारा  और हम चर्चा कर रहे हैं बहुत-ही सुन्दर श्लोक पर जिसका अर्थ है:

हे अर्जुन!तुम्हे सदैव कृष्ण रूप में मेरा चिंतन करना चाहिए और साथ ही युद्ध करने के कर्त्तव्य को भी पूरा करना चाहिए.अपने कर्मों को मुझे समर्पित करके तथा अपने मन एवं बुद्धि को मुझमे स्थिर करके तुम निश्चित रूप से मुझे प्राप्त कर सकोगे.

तो देखिये यहाँ अर्जुन को कहा गया है कि तुम्हे मेरा चिंतन करना चाहिए और युद्ध भी करना चाहिए.दोनों चीजें करनी चाहिए.कभी आपने सुना है कि दो चीजें,दो काम एक साथ हो.थोडा मुश्किल है न.दो काम एक साथ कैसे हो सकता है.लेकिन भगवान कहते हैं कि मन से मेरे बारे में सोचो और तन से अपने कर्त्तव्य को पूर्ण करो.अर्जुन योद्धा थे तो ये अर्जुन का कर्त्तव्य था कि वे युद्ध करे.तो भगवान ने कहा कि देखिये जब आप इतने हिंसक कार्य को कर रहे हैं तो बेशक ये हिंसक कार्य पाप है.लेकिन याद रखना कि ये मेरी आज्ञा से आप कर रहे हैं.मैंने आपको आज्ञा दी है कि आप जो अन्यायी लोग हैं उनका वध करे.

जैसे कि अगर सरकार किसी सैनिक को यह आज्ञा देती है कि वह front पर जाकर लड़ाई करे और वे जब अधिकाधिक शत्रुओं का वध करते हैं तो फिर सरकार उन्हें मेडल देती है.यह पाप नही है.इसीप्रकार जब भगवान की आज्ञा है की आप जाकर के आतातायी लोगों का वध करे.अधर्म का नाश करे और धर्म की स्थापना कीजिये तब ये पाप नही है.और वो भी किसतरह से कीजिये.मेरे लिए कीजिये.मुझे याद करते हुए कीजिये.

तो देखिये याद करने का काम आँखों का नही.याद करने का काम नाक का नही है.याद करने का काम कान का नही है.याद करने का काम सिर्फ और सिर्फ मन का है.शुद्ध मन का है.

तो मन युद्ध नही कर रहा.तन युद्ध कर रहा है.मन खाना नही बना रहा तन खाना बना रहा है.मन पढाई नही कर रहा तन पढाई कर रहा है.है न.तो भगवान ने यहाँ तरीका बताया है कि भाई जो कुछ कर्त्तव्य आपका है उस कर्त्तव्य को आप पूरा करिये.काम करने के लिए भगवान मना नही करते.अर्जुन ने एकबार कहा कि मै जाकर के संन्यास ले लेता हूँ.किसी गुफा में बैठकर के भगवान का नाम लूँगा.ये हिंसा मुझे नही करनी है.तो भगवान ने कहा कि नही,ये तो आपका कर्त्तव्य है क्योंकि आप योद्धा है,क्षत्रिय हैं.

तो इसीप्रकार से अगर एक student कहे ,एक विद्यार्थी कहे कि नही मुझे तो भगवान का नाम लेना है ,मुझे पढ़ाई नही करनी.तो आप इस श्लोक से सीख सकते हैं.भगवान कहते हैं कि नही,पढाई करनी है.अपने कर्त्तव्य को पूर्ण करना हैऔर उस पढाई को भी मुझे समर्पित कर दो.और जब तुम ऐसा करोगे तो उस कार्य से बंधोगे नही.पहली बात.और दूसरी बात कि तुम मेरा चिंतन करो.मेरे बारे में सोचो,मेरे ख्यालों में डूबो.तुम ऐसा करोगे तो तुम सारे कामों को करते हुए भी मुक्त रहोगे और मुझे प्राप्त कर पाओगे.
श्रोत व्हाट्सअप ग्रुप भक्तिसागर

Monday, 11 January 2016

.ईश्वर पर भरोसा रखो, शांति का

ईश्वर पर भरोसा रखो, शांति का यही एकमात्र रास्ता है।एक व्यापारी था, उसने व्यापार में खूब कमाई की।बड़े-बड़े मकान बनाए, नौकर-चाकर रखे, लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि उसके दिन फिर गए।व्यापार में घाटा आया और वह एक-एक पैसे के लिए मोहताज हो गया।जब उसकी परेशानी सहन से बाहर हो गई, तब वह एक साधु बाबा के पास गया और रोते हुए बोला:- "महाराज, मुझे कोई रास्ता बताइए, जिससे मुझे शांति मिले।"साधु बाबा ने पूछा:- "तुम्हारा सब कुछ चला गया?"व्यापारी ने कहा - "जी हां"साधु बाबा बोले - "तुम्हारा था तो उसे तुम्हारे पास रहना चाहिए था, वहचला कैसे गया?"साधु बाबा की बात सुनकर व्यापारी चुप हो गया।साधु बाबा ने फिर पूछा:- "जन्म के समय तुम अपने साथ कितना धन लाए थे?"व्यापारी ने कहा:- "स्वामीजी, जन्म के समय तो सब खाली हाथ आते हैं।"साधु बाबा बोले:- "ठीक है, अब यह बताओकि मरते समय अपने साथ कितना ले जानाचाहते हो?"व्यापारी बोला:- "मरते समय साथ कौन ले जाता है, जो मैं ले जाऊंगा।"साधु बाबा ने फिर कहा:- "जब तुम खाली हाथ आए थे और खाली हाथ जाओगे तो फिर चिंता किस बात की करते हो?"व्यापारी ने कहा:- "महाराज, जब तक मौत नहीं आती, तब तक मेरी और मेरे घरवालों की गुजर-बसर कैसे होगी?"साधु बाबा हंस पड़े और बोले:- "जो धन के भरोसे रहेगा, उसका यही हाल होगा।तुम्हारे हाथ-पैर तो हैं, उन्हें काम में लाओ, पुरुषार्थ सबसे बड़ा धन है, और ईश्वर पर भरोसा रखो, शांतिका यही एकमात्र रास्ता है।"साधु बाबा की बातें सुनकर व्यापारी की आंखें खुल गईं, उसका मनशांत हो गया।जाने कितने वर्षों के बाद पहली बार रात को उसे चैन की नींद आई और उसके शेष वर्ष बड़े आनंद में बीते...

Tuesday, 5 January 2016

आज के कलयुग मे यह सारी बाते सच साबित हो रही है ।

पाण्डवो का अज्ञातवाश समाप्त होने मे कुछ समय शेष रह गया था।

पाँचो पाण्डव एवं द्रोपदी जंगल मे छूपने का स्थान ढूढं रहे थे,

उधर शनिदेव की आकाश मंडल से पाण्डवों पर नजर पडी शनिदेव के मन मे विचार आया कि इन सब मे बुधिमान कौन है परिक्षा ली जाय।

देव ने एक माया का महल बनाया कई योजन दूरी मे उस महल के चार कोने थे, पूरब, पश्चिम, उतर, दक्षिन।

अचानक भीम की नजर महल पर पडी
और वो आकर्सित हो गया ,

भीम, यधिष्ठिर से बोला-भैया मुझे महल देखना है भाई ने कहा जाओ ।

भीम महल के द्वार पर पहुँचा वहाँ शनिदेव दरबान के रूप मे खड़े थे,

भीम बोला- मुझे महल देखना है!

शनिदेव ने कहा-महल की कुछ शर्त है

1-शर्त महल मे चार कोने आप एक ही कोना देख सकते है।
2-शर्त महल मे जो देखोगे उसकी सार सहित व्याख्या करोगे।
3-अगर व्याख्या नही कर सके तो कैद कर लिए जावोगे।

भीम ने कहा- मै स्वीकार करता हूँ ऐसा ही होगा

और वह महल के पूर्व क्षोर की और गया

वहां जाकर उसने अधभूत पशु पक्षी और फुलों एवं फलों से लदै वृक्षो का नजारा किया,

आगे जाकर देखता है कि तीन कूऐ है अगल-बगल मे छोटे कूऐ और बीच मे एक बडा कुआ।

बीच वाला बडे कुए मे पानी का उफान आता है और दोनो छोटे खाली कुओ को पानी से भर दता है। फिर कुछ देर बाद दोनो छोटे कुओ मे उफान आता है तो खाली पडे बडे कुऐ का पानी आधा रह जाता है इस क्रिया को भीम कई बार देखता है पर समझ नही पाता और लौट कर दरबान के पास आता है।

दरबान -क्या देखा आपने?

भीम- महाशय मैने पेड पौधे पशु पक्षी देखा वो मैने पहले कभी नही देखा था जो अजीब थे। एकबात समझ मे नही आई छोटे कुऐ पानी से भर जाते है बडा क्यो नही भर पाता ये समझ मे नही आया।

दरबान बोला आप शर्त के अनुसार बंदी हो गये है और बंदी घर मे बैठा दिया।

अर्जुन आया बोला- मुझे महल देखना है, दरबान ने शर्त बतादी और अर्जुन पश्चिम वाले क्षोर की तरफ चला गया।

आगे जाकर अर्जुन क्या देखता है। एक खेत मे दो फसल उग रही थी एक तरफ बाजरे की फसल दुसरी तरफ मक्का की फसल ।

बाजरे के पौधे से मक्का निकल रही तथा
मक्का के पौधे से बाजरी निकल रही अजीब लगा कुछ समझ नही आया वापिस द्वार पर आ गया।

दरबान ने पुछा क्या देखा,

अर्जुन बोला महाशय सब कुछ देखा पर बाजरा और मक्का की बात समझ मे नही आई।

देव ने कहा शर्त के अनुसार आप बंदी है ।

नकुल आया बोला मुझे महल देखना है

फिर वह उतर दिशा की और गया वहाँ उसने देखा कि बहुत सारी सफेद गायें जब उनको भूख लगती है तो अपनी छोटी बाछियों का दुध पीती है उसके कुछ समझ नही आया द्वार पर आया

देव ने पुछा क्या देखा?

नकुल बोला महाशय गाय बाछियों का दुध पिती है यह समझ नही आया तब उसे भी बंदी बना लिया।

सहदेव आया बोला मुझे महल देखना है और वह दक्षिण दिशा की और गया अंतिम कोना देखने के लिए क्या दे खता है वहां पर एक सोने की बडी शिला एक चांदी के सिक्के पर टिकी हुई डगमग डौले पर गिरे नही छूने पर भी वैसे ही रहती है समझ नही आया वह वापिस द्वार पर आ गया और बोला सोने की शिला की बात समझ मे नही आई तब वह भी बंदी हो गया।

चारों भाई बहुत देर से नही आये तब युधिष्ठिर को चिंता हुई वह भी द्रोपदी सहित महल मे गये।

भाईयो के लिए पूछा तब दरबान ने बताया वो शर्त अनुसार बंदी है।

युधिष्ठिर बोला भीम तुमने क्या देखा ?

भीम ने कुऐ के बारे मे बताया

तब युधिष्ठिर ने कहा-यह कलियुग मे होने वाला है एक बाप दो बेटों का पेट तो भर देगा परन्तु दो बेटे मिलकर एक बाप का पेट नही भर पायागें।

भीम को छोड दिया।

अर्जुन से पुछा तुमने क्या देखा ??

उसने फसल के बारे मे बताया

युधिष्ठिर ने कहा- यह भी कलियुग मे होने वाला है वंश परिवर्तन अर्थात ब्राहमन के घर बनिये की लडकी और बनिये के घर शुद्र की लडकी ब्याही जायेगी।

अर्जुन भी छूट गया।

नकुल से पूछा तुमने क्या देखा तब उसने गाय का व्र्तान्त बताया

तब युधिष्ठिर ने कहा-कलियुग मे माताऐं अपनी बेटियों के घर मे पलेगी बेटी का दाना खायेगी और बेटे सेवा नही करेंगे ।

तब नकुल भी छूट गया।

सहदेव से पूछा तुमने क्या देखा, उसने सोने की शिला का वर्तान्त बताया,

तब युधिष्ठिर बोले-कलियुग मे पाप धर्म को दबाता रहेगा परन्तु धर्म फिर भी जिदां रहेगा खत्म नही होगा।।

आज के कलयुग मे यह सारी बाते सच साबित हो रही है ।।

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

भक्ति सागर

ॐ ब‌िहारी जी की ख‌िचड़ी कर गई कमाल ॐ

साध्वी कर्माबाई बांके बिहारी को बालभाव से भजती थीं। भाव भक्ति के आवेश में वह बिहारी जी से रोज बातें किया करती थीं। एक दिन उसने कहा, मैं आपको अपने हाथ से कुछ बनाकर खिलाना चाहती हूं। बिहारी जी ने कहा, ठीक है। अगले दिन कर्माबाई ने खिचड़ी बनाई और बिहारी जी को भोग लगाया। बिहारी जी को कर्मा की बनाई खिचड़ी इतनी अच्छी लगी कि वह रोज आने लगे। कर्माबाई भी रोज सुबह उठकर सबसे पहले खिचड़ी बनातीं।

एक बार कोई संत कर्माबाई के पास आए। उन्होंने देखा, तो बोले, आप सुबह उठते ही खिचड़ी क्यों बनाती हैं? न नहाया, न रसोई साफ की। अगले दिन कर्माबाई ने वैसा ही किया। जैसे ही सुबह हुई, भगवान आए और बोले, मां खिचड़ी लाओ। कर्माबाई ने कहा, अभी मैं स्नान कर रही हूं, थोड़ा रुको! थोड़ी देर बाद भगवान ने आवाज लगाई, जल्दी कर मां, मंदिर के पट खुल जाएंगे, मुझे जाना है।

मगर कर्मा ने संत के बताए अनुसार स्नान-ध्यान किया, तब खिचड़ी बनाई। भगवान ने जल्दी-जल्दी खिचड़ी खाई और बिना पानी पिए ही निकल गए। बाहर संत को देखा, तो वह समझ गए। पुजारी ने जैसे ही मंदिर के पट खोले, तो देखा, भगवान के मुख में खिचड़ी लगी थी। वह बोले, प्रभु! यह खिचड़ी मुख में कैसे लग गई।

भगवान ने सारा वाकया सुनाया और पुजारी से कहा, मां से कहना कि नियम-धर्म संतों के लिए है। वह तो पहले की तरह ही भोजन बनाए। अगले दिन से उसी तरह खिचड़ी बननी शुरू हो गई। कर्माबाई का निधन हो गया, तो भगवान बहुत रोए। वह कहने लगे, मुझे कौन खिचड़ी खिलाएगा? इसके बाद व्यवस्था बनी कि सबसे पहले खिचड़ी का भोग ही लगेगा।

प्रश्नोत्तरी और सत्संग

प्रश्नोत्तरी और सत्संग --

भगवान मीठे कैसे लगे ?
- भगवान मीठे लगेंगे संसार खारा लगने से ।

भगवान में प्रेम कैसे बढ़े ?
- हम केवल भगवान के ही अंश हैं , अतः वे ही अपने है । उनके सिवाय और कोई भी अपना नहीँ है । इस प्रकार भगवान में अपनापन होने से प्रेम स्वतः बढेगा । इसके सिवाय भगवान् से प्रार्थना करनी चाहिए कि " हे नाथ ! आप मीठे लगो , प्यारे लगो । " भगवान का गुणगान करने से उनका चरित्र पढ़ने से , उनके नाम का कीर्तन करने से उनमें प्रेम हो जाता है । भगवान के चरित्र से भी भक्त-चरित्र पढ़ने का अधिक माहात्म्य है ।

यदि हम निष्काम भाव से किसी व्यक्ति से प्रेम करें तो उसका क्या परिणाम होगा ?
- कामना के कारण ही संसार है । कामना न हो तो सब कुछ परमात्मा ही है ,  संसार है ही नहीँ । निष्काम प्रेम होने पर संसार नहीँ रहेगा । कामना गयी तो संसार गया । इसलिए निष्काम भाव से किसी के भी साथ प्रेम करें तो वह भगवान् में ही हो जायेगा ।

भगवान में प्रेम की भूख क्यों है ?
भगवान में अपार प्रेम है इसलिए उनमें प्रेम की भूख है , जैसे मनुष्य के पास जितना ज्यादा धन होता है , उतनी ही ज्यादा धन की भूख होती है । भगवान में प्रेम की कोई कमी नहीँ है , पर प्रेम की भूख है ।

भक्ति और भक्तियोग में क्या अंतर है ?
- सकाम भाव होने पर भक्ति होती है और निष्कामभाव होने पर भक्तियोग होता है । योग निष्कामभाव होने पर ही होता है ।
- स्वामी रामसुखदास जी ।

शारीरिक कष्टों को कैसे भूला जाये ?
- भुला न जाएं  , सहा जाए , चिंता-विलाप से रहित होकर । यह तप है । तप से शक्ति बढ़ती है । भूलने से तो जड़ता आवेगी । शरीर से तितिक्षा होनी चाहिए । तितिक्षा का अर्थ है हर्ष पूर्वक कष्ट को सहन करना ।

आसक्ति रहित होकर कार्य करने से क्या तात्पर्य है ?
- जिस कार्य को करने में अपना सुख निहित नहीँ होता , जो सर्वहितकारी दृष्टि से किया जाता है , वह आसक्ति रहित कार्य कहलाता है ।

भगवत्प्राप्ति में विघ्न क्या है ?
- संसार को पसन्द करना ही सबसे बड़ा विघ्न है ।

भगवान छिपा क्यों रहता है ?
- भगवान के प्रति आस्था, श्रद्धा, विश्वापूर्वक आत्मीयता और प्रियता जाग्रत नहीँ हुई ।

मन में गहरे विकार पैदा होते रहते हैं, क्या करुँ ?
- गहरी वेदना होनी चाहिये ।

होली का क्या महत्व है ?
- राग-द्वेष को अग्नि में जला दो , देहाभिमान को मिट्टी में मिला दो और प्रेम के रंग में रंग जाओ ।

मोह निवृति का उपाय बताईये ?
- मोह की निवृत्ति तो कई प्रकार से होती है -
१ आस्था के आधार पर - केवल प्रभु मेरे अपने हैं ।
२ ज्ञान के आधार पर - आसक्ति छोड़ने से ।
३ सेवा के आधार पर - सेवा करें, कुछ न चाहे ।

सम्मान के सुख से नुकसान क्या है ?
- सम्मान के सुख इतना भयंकर विष है कि विष खाने से तो मनुष्य एक ही बार मरता है , परन्तु सम्मान के सुख भोगने से कई बार जीता-मरता है ।

बन्धन क्या है ?
लेना बन्धन है । लेना बन्द करके , देना शुरू करने पर बन्धन जैसी चीज़ नहीँ रहती ।

लेने में क्या बुराई है ?
- लेने की रूचि ही नए राग की जननी है , जो पूरी न होने पर क्रोधित कर देती है । क्रोधित होने पर कर्तव्य की , निज स्वरूप की एवम् प्रभु की विस्मृति हो जाती है ।

मन भटकता रहता है ?
- मन कहीँ नहीँ भटकता । तुम संसार को चाहते हो , उसकी याद आती है । यह दोष अपना है ।

सुख और आनन्द में क्या अंतर है ?
- सुख से दुःख दब जाता है , दुःख मिटता नहीँ , केवल दबता है । आनन्द से दुःख मिट ही जाता है ।

जड़ क्या है ?
- जो दूसरों की सत्ता से प्रकाशित हो , जो स्वाधीन न हो , और जो पराधीन हो वह जड़ है ।

चेतना क्या है ?
- चेतना सूर्य के समान है जो स्वयं प्रकाशित है और जिससे जड़ पदार्थ प्रकाशित होते हैं ।

आनन्द क्या है ?
- जो होकर कभी भी नहीँ मिटे , जिसके मिलने पर फिर और कुछ पाने की इच्छा न रहे , जहाँ सदा बहती रस धारा हो । जिसका विराम न दीखता हो , वहीँ आनन्द है ।
- शरणानन्द जी ।।

सत्संगी ने संत से पूछा -- ' महात्मन् ! यदि हमारे अंदर भगवान के लिए व्याकुलता नहीँ हो , तो क्या वें हमें नहीँ मिलेगें ?
महात्मा - क्यों नहीँ मिलेंगे ! अवश्य मिलेंगे ! मिलना ही उनका जीवन है  , मिलना ही उनका जीवन मत है । बिना मिले वें रह ही नहीँ सकते । ऐसा क्यों , वें तो प्रतिदिन हज़ारो रूपों में हमसे मिलते भी है । हम उन्हें पहचानते नहीँ, इसी से उनके मिलने के आनन्द से वंचित रह जाते है । परन्तु हमारे न पहचानने से उनकी छिपने की लीला तो पूरी होती ही है , वें हमारे इस भोलेपन का आनन्द भी लेते है ।

सत्संगी - ' तब कटा हमें ही पहचानना पड़ेगा । यदि उनके मिलने पर भी हम उन्हें नहीँ पहचान सकते तो हमारे जीवन में इससे महत्वपूर्ण कौनसी घटना घटेगी कि हम उनको पहचानकर उनके आलिंगन का सुख प्राप्त कर सकेंगे ?
-- यह तो उनकी एक लीला है । जब तक वें आँख मिचौनी खेल रहे हैं , उनकी इच्छा अपने को पहचान में लाने की नहीँ हैं , तब तक किसका सामर्थ्य है कि उन्हें पहचान सकें ! परन्तु वें कब तक छिपेगे ? वे जैसे नचावैं, नाचते जाओ । कभी तो रीझेंगे ही । यदि रिंझकर उन्होंने अपना पर्दा-बनावटी वेश दूर कर दिया , तब तो कहना ही क्या है ? और यदि छिपे ही रहे तो भी हम उनके सामने ही तो नाच रहे हैं । हम चाहे उन्हें न देंखें, वे तो हमे देख रहे है न ? बस, वें हमें और हमारी प्रत्येक चेष्टा को देख रहे है और उनकी प्रसन्नता के लिए मैं रंगमंच में नाच रहा हूँ -इतना भाव रखकर, जैसे रखें, रहो । अभिनय सुंदर रहे और भीतर उनसे आत्मसात करें तो वें अवश्य तुम्हें अपनी पहचान बताएंगे, मिलेंगें ।

जय जय श्री राधे श्याम